रामगढ़ के नेमरा गांव से जुड़ी रूपी सोरेन की जीवन-यात्रा झारखंड आंदोलन के कठिन दौर में परिवार संभालने और संकटों का सामना करने की कहानी भी रही। बुधवार को उनके निधन के बाद उनसे जुड़े कई पुराने प्रसंग फिर चर्चा में आए हैं। पारिवारिक विवरण के अनुसार, शिबू सोरेन के आंदोलन, कानूनी संघर्ष और लंबे समय तक घर से दूर रहने के दौरान रूपी सोरेन परिवार की प्रमुख आधार बनी रहीं।
दुमका विधायक बसंत सोरेन के हवाले से सामने आए विवरण में बताया गया है कि रूपी सोरेन का विवाह वर्ष 1962 में शिबू सोरेन से हुआ था। विवाह के कुछ समय बाद ही शिबू सोरेन को हजारीबाग जेल भेज दिया गया। उस समय परिवार की आर्थिक स्थिति कमजोर थी और रिहाई के लिए जरूरी व्यवस्था करना आसान नहीं था।
परिवार से सुने प्रसंगों के अनुसार, रूपी सोरेन ने गांव में सहायता मांगी और फिर मायके चांडिल पहुंचीं। उनके पिता ने धन की व्यवस्था की और उनके साथ हजारीबाग गए। इसके बाद शिबू सोरेन जेल से बाहर आए और नेमरा लौटे। कमजोर हो चुके शिबू सोरेन की देखभाल कर उन्हें स्वस्थ करने की जिम्मेदारी भी रूपी सोरेन ने निभाई।
आंदोलन के वर्षों में शिबू सोरेन लंबे समय तक जंगलों और पारसनाथ की पहाड़ियों में रहते थे। इस अवधि में बच्चों के पालन-पोषण और घर की पूरी जिम्मेदारी रूपी सोरेन के कंधों पर रही। परिवार के अनुसार, जब लंबे समय तक शिबू सोरेन की कोई खबर नहीं मिली, तब वह अपनी सास और ननद के साथ उन्हें खोजने जंगल तक गई थीं। उस समय दुर्गा सोरेन भी उनकी गोद में थे।
महाजनों के दबाव का सामना करने से जुड़ा एक प्रसंग भी परिवार ने साझा किया है। बताया गया कि एक व्यक्ति कुछ लोगों के साथ जबरन खेत जोतने पहुंचा था। विरोध के बावजूद उसके नहीं रुकने पर रूपी सोरेन हंसुआ लेकर उसके पीछे दौड़ीं और खेत पर कब्जे की कोशिश रोक दी। यह विवरण उस दौर में घर और जमीन बचाने के लिए उनके प्रतिरोध को रेखांकित करता है।
वर्ष 1970 के आसपास पुलिस की आवाजाही और पूछताछ बढ़ने का भी उल्लेख मिलता है। एक मौके पर लगातार सवाल किए जाने पर रूपी सोरेन ने पुलिस से कहा था कि यह उनका घर है और शिबू सोरेन को वहीं खोजा जाए, जहां वे हैं। ऐसे प्रसंग बताते हैं कि राजनीतिक आंदोलन के सार्वजनिक संघर्ष के समानांतर रूपी सोरेन ने परिवार, बच्चों और घर की सुरक्षा का दायित्व लगातार निभाया।