वाराणसी-रांची-कोलकाता ग्रीनफील्ड हाईवे के 141 किमी हिस्से को स्टेज-1 वन स्वीकृति

हजारीबाग पीआईयू के अंतर्गत चार पैकेजों में बन रहे ग्रीनफील्ड हाईवे के लिए सभी संबंधित वन प्रमंडलों में स्टेज-1 स्वीकृति मिल गई है। वन संबंधी मदों में करीब 305.30 करोड़ रुपये जमा किए गए हैं।

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हजारीबाग में निर्माणाधीन ग्रीनफील्ड हाईवे परियोजना का प्रतिनिधि दृश्य

वाराणसी-रांची-कोलकाता ग्रीनफील्ड हाईवे के झारखंड स्थित करीब 141 किलोमीटर लंबे हिस्से के निर्माण की प्रक्रिया आगे बढ़ी है। हजारीबाग परियोजना कार्यान्वयन इकाई के अंतर्गत आने वाले चारों पैकेजों के लिए संबंधित वन प्रमंडलों में स्टेज-1 वन स्वीकृति मिल गई है। भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण परियोजना से जुड़ी शेष अनुमतियों के लिए वन विभाग और प्रशासनिक अधिकारियों के साथ समन्वय कर रहा है।

भारतमाला परियोजना के तहत विकसित किए जा रहे इस हिस्से को चार पैकेजों में बांटा गया है। इनमें पैकेज-8 की लंबाई 37.3 किलोमीटर, पैकेज-9 की 31 किलोमीटर, पैकेज-10 की 35.6 किलोमीटर और पैकेज-11 की 36.9 किलोमीटर है। चारों को मिलाकर कुल लंबाई 140.8 किलोमीटर होती है, जिसे लगभग 141 किलोमीटर बताया गया है।

परियोजना के दायरे में चतरा नॉर्थ, चतरा साउथ, हजारीबाग वेस्ट और रामगढ़ वन प्रमंडल आते हैं। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, सभी चार वन प्रमंडलों में स्टेज-1 वन स्वीकृति प्राप्त हो चुकी है। चतरा नॉर्थ और चतरा साउथ में निर्माण से संबंधित वर्किंग परमिशन भी मिल गई है।

वन भूमि से जुड़ी प्रतिपूरक देनदारियों के तहत लगभग 305.30 करोड़ रुपये जमा किए गए हैं। इसमें चतरा नॉर्थ में 58.95 करोड़, चतरा साउथ में 121.03 करोड़, हजारीबाग वेस्ट में 58.99 करोड़ और रामगढ़ वन प्रमंडल में 66.32 करोड़ रुपये शामिल हैं। यह राशि प्रतिपूरक वनीकरण, शुद्ध वर्तमान मूल्य और अन्य वन संबंधी मदों के लिए दी गई है।

अब वन भूमि हस्तांतरण की बची हुई औपचारिकताओं और पेड़ों की कटाई के लिए आवश्यक अनुमति पर कार्रवाई चल रही है। परियोजना निदेशक आशुतोष सोनी के अनुसार, इन प्रक्रियाओं को नियमों के मुताबिक पूरा करने के लिए संबंधित विभागों से लगातार समन्वय किया जा रहा है। अनुमतियां पूरी होने के साथ निर्माण कार्य की रफ्तार बढ़ने की संभावना है।

यह ग्रीनफील्ड मार्ग झारखंड सहित पूर्वी भारत के सड़क संपर्क से जुड़ी बड़ी परियोजना है। परियोजना का उद्देश्य वाराणसी, रांची और कोलकाता के बीच संपर्क को मजबूत करना, यात्रा अवधि कम करना और माल परिवहन को अधिक सुगम बनाना है। हालांकि निर्माण की अगली गति वन भूमि से संबंधित शेष वैधानिक प्रक्रियाओं के पूरा होने पर निर्भर करेगी।