विभावि में गैर-शैक्षणिक कर्मियों के 312 पद खाली, प्रशासनिक कामकाज पर बढ़ा दबाव

हजारीबाग स्थित विनोबा भावे विश्वविद्यालय और उसके अंगीभूत कॉलेजों में 378 स्वीकृत गैर-शैक्षणिक पदों के मुकाबले केवल 66 कर्मचारी कार्यरत हैं। नियमित बहाली और प्रोन्नति लंबे समय से लंबित है।

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हजारीबाग स्थित विनोबा भावे विश्वविद्यालय का परिसर और प्रशासनिक भवन

हजारीबाग स्थित विनोबा भावे विश्वविद्यालय और उसके अंगीभूत महाविद्यालय गैर-शैक्षणिक कर्मचारियों की गंभीर कमी से जूझ रहे हैं। उपलब्ध विवरण के अनुसार, इस श्रेणी के कुल 378 स्वीकृत पद हैं, लेकिन वर्तमान में केवल 66 कर्मचारी कार्यरत हैं। इस तरह 312 पद खाली हैं और सीमित कर्मचारियों पर कार्यालयी तथा प्रशासनिक काम का अतिरिक्त दबाव पड़ रहा है।

विश्वविद्यालय और कॉलेजों में गैर-शैक्षणिक कर्मचारियों की आखिरी नियमित नियुक्ति वर्ष 1998 में हुई थी। इसके बाद नियमित बहाली नहीं होने से रिक्त पदों की संख्या लगातार बनी रही। रिपोर्ट में नियुक्ति प्रक्रिया की प्रमुख अड़चन के रूप में राज्य सरकार के स्तर पर रोस्टर स्पष्ट नहीं होने की बात कही गई है।

नियमित कर्मचारियों की कमी के बीच विश्वविद्यालय प्रशासन वैकल्पिक व्यवस्था से काम चला रहा है। कंप्यूटर ऑपरेटर सहित दैनिक मजदूरी पर कार्यरत कर्मियों से अलग-अलग कार्यालयों में काम लिया जा रहा है। समय-समय पर अनुकंपा के आधार पर भी नियुक्तियां हुई हैं, लेकिन इन व्यवस्थाओं से स्वीकृत पदों की व्यापक कमी दूर नहीं हुई है।

समस्या केवल खाली पदों तक सीमित नहीं है। वर्ष 1998 में नियुक्त कर्मचारियों की नियमित प्रोन्नति भी करीब तीन दशक से लंबित बताई गई है। नियमानुसार समय-समय पर पदोन्नति की व्यवस्था होने के बावजूद प्रक्रिया पूरी नहीं होने से कर्मचारियों में निराशा बनी हुई है।

वर्ष 2019 में प्रोन्नति प्रक्रिया आगे बढ़ने पर कर्मचारियों ने लिखित परीक्षा दी थी। इसके बाद कोविड-19 महामारी के दौरान प्रक्रिया रुक गई और स्थिति सामान्य होने के कई वर्ष बाद भी मामला लंबित है। बीते वर्षों में विश्वविद्यालय में पूर्णकालिक कुलपति को लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं रहने का असर भी प्रोन्नति समेत प्रशासनिक मामलों पर पड़ने की बात सामने आई है।

पिछले वर्ष प्रोफेसर चंद्र भूषण शर्मा की कुलपति के रूप में नियुक्ति के बाद कर्मचारियों में लंबित प्रोन्नति प्रक्रिया आगे बढ़ने की उम्मीद जगी है। अब निगाह इस बात पर है कि विश्वविद्यालय प्रशासन रिक्त पदों और पदोन्नति से जुड़े मामलों में क्या पहल करता है। मौजूदा आंकड़े बताते हैं कि स्वीकृत पदों का बड़ा हिस्सा खाली रहने से संस्थान की प्रशासनिक क्षमता पर दबाव बना हुआ है।