लातेहार जिले के बेतला में स्थित ऐतिहासिक पलामू किले की बची हुई संरचनाओं के संरक्षण को लेकर चिंता बढ़ रही है। करीब साढ़े तीन सौ वर्ष पुराने इस किले का जीर्णोद्धार अब तक शुरू नहीं हो सका है। लगभग एक वर्ग किलोमीटर में फैली यह धरोहर चेरो राजवंश के इतिहास और क्षेत्र की पुरानी स्थापत्य परंपरा से जुड़ी है।
कुछ वर्ष पहले पुरातात्विक विभाग की ओर से कराए गए सर्वे के अनुसार, उचित रखरखाव नहीं होने से किले का करीब 90 प्रतिशत हिस्सा जमींदोज हो चुका है। अब लगभग 10 प्रतिशत ऐतिहासिक संरचना ही शेष बताई जा रही है। घने जंगल और झाड़ियों के बीच मौजूद दीवारों तथा अन्य अवशेषों को पेड़ों की मोटी जड़ें भी लगातार नुकसान पहुंचा रही हैं।
किले को राजा मेदिनी राय और प्रताप राय के शासनकाल की स्थापत्य विरासत से जोड़कर देखा जाता है। इसी ऐतिहासिक महत्व के कारण पलामू किले की पहचान केवल एक पुराने भवन के रूप में नहीं, बल्कि चेरो राजवंश और पलामू क्षेत्र के इतिहास को सहेजने वाले महत्वपूर्ण स्थल के तौर पर है।
संरक्षण की राह में किले की भौगोलिक स्थिति भी एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। यह पलामू टाइगर रिजर्व के कोर क्षेत्र में स्थित है, जहां निर्माण कार्य और भारी मशीनरी के उपयोग पर वन्यजीव तथा पर्यावरण संरक्षण से जुड़े कड़े नियम लागू होते हैं। आवश्यक अनापत्ति प्रमाणपत्र हासिल करने में समय लगने के कारण जीर्णोद्धार की योजना आगे नहीं बढ़ सकी।
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण और राज्य सरकार के स्तर पर जरूरी स्वीकृतियों के साथ विभिन्न विभागों के बीच समन्वय की प्रक्रिया भी संरक्षण कार्य से जुड़ी रही है। पुरातत्व विशेषज्ञों का मानना है कि बची दीवारों और दूसरी संरचनाओं की शीघ्र मरम्मत तथा देखरेख नहीं हुई तो किले को आगे और क्षति पहुंच सकती है।
स्थानीय लोगों ने भी शेष विरासत को समय रहते सुरक्षित करने की जरूरत बताई है। उनका कहना है कि संरक्षण में और देरी होने पर आने वाली पीढ़ियां पलामू किले की ऐतिहासिक संरचनाओं को प्रत्यक्ष रूप से देखने से वंचित हो सकती हैं। अब मुख्य चुनौती पर्यावरणीय नियमों का पालन करते हुए किले के बचे हिस्से के लिए प्रभावी संरक्षण कार्य शुरू करने की है।