साहिबगंज में हिंदी दिवस पर भाषा के दैनिक प्रयोग और रोजगार की संभावनाओं पर चर्चा

साहिबगंज के संध्या कॉलेज में हिंदी के महत्व पर कार्यक्रम हुआ, जबकि मॉडल डिग्री कॉलेज की ऑनलाइन संगोष्ठी में हिंदी से जुड़े रोजगार क्षेत्रों की जानकारी दी गई।

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साहिबगंज में हिंदी दिवस के अवसर पर आयोजित दो कार्यक्रमों में मातृभाषा के दैनिक प्रयोग, राष्ट्रीय विकास में हिंदी की भूमिका और भाषा से जुड़े रोजगार के अवसरों पर चर्चा हुई। संध्या कॉलेज का कार्यक्रम झारखंड राज्य भाषा साहित्य अकादमी की साहिबगंज इकाई और मनोरंजन भोजपुरी साहित्य परिषद ने संयुक्त रूप से आयोजित किया।

संध्या कॉलेज में कार्यक्रम की शुरुआत मुख्य अतिथि सिविल सर्जन डॉ. रामदेव पासवान, प्राचार्य शंभूनाथ पाठक, अकादमी के सचिव डॉ. सच्चिदानंद और शिक्षक पीएन तिवारी ने दीप प्रज्वलित कर की। कॉलेज की प्राचार्या ने मुख्य अतिथि का स्वागत और सम्मान भी किया।

डॉ. रामदेव पासवान ने हिंदी को देश के व्यापक जनसमुदाय से जुड़ी भाषा बताते हुए राष्ट्र के विकास और सभ्यता के उत्थान में उसकी भूमिका पर विचार रखे। उन्होंने मातृभाषा का महत्व पहचानने तथा रोजमर्रा के जीवन में उसका अधिक प्रयोग करने पर जोर दिया। प्राचार्य ने स्वतंत्रता आंदोलन से लेकर उसके बाद के राष्ट्र निर्माण तक हिंदी के महत्व को रेखांकित किया।

राजमहल के मुरली स्थित मॉडल डिग्री कॉलेज में प्राचार्य डॉ. सिदाम सिंह मुंडा की अध्यक्षता में ‘हिंदी में रोजगार के अवसर’ विषय पर ऑनलाइन संगोष्ठी हुई। हिंदी विभाग के सहायक प्राध्यापक डॉ. अमित कुमार ने इसका आयोजन किया। मुंबई विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के प्रोफेसर डॉ. सचिन गपाट मुख्य वक्ता के रूप में ऑनलाइन जुड़े।

संगोष्ठी में हिंदी की उत्पत्ति, विकास, लोकप्रियता और मौजूदा रोजगार संभावनाओं पर जानकारी दी गई। चर्चा के दौरान समाचार और पटकथा लेखन, कंटेंट राइटिंग, डिजिटल मीडिया, विज्ञापन, स्लोगन लेखन तथा कृत्रिम बुद्धिमत्ता के लिए हिंदी डेटा तैयार करने जैसे क्षेत्रों का उल्लेख किया गया। वक्ताओं ने हिंदी को विभिन्न क्षेत्रों और समुदायों को जोड़ने वाली भाषा बताया।

मॉडल डिग्री कॉलेज के प्राचार्य डॉ. सिदाम सिंह मुंडा ने भी हिंदी की सामाजिक भूमिका पर अपनी बात रखी। साहिबगंज कॉलेज के प्राचार्य डॉ. रणजीत कुमार सिंह ने हिंदी दिवस की शुभकामनाएं दीं। संगोष्ठी में कॉलेज के शिक्षक शामिल हुए, जबकि संध्या कॉलेज के आयोजन में भी शिक्षकों और साहित्य से जुड़े प्रतिनिधियों की भागीदारी रही।