बिहार और झारखंड के बीच सोन नदी के पानी के बंटवारे पर समझौते के बाद पलामू और गढ़वा के बड़े हिस्से में सिंचाई सुविधा बढ़ने की उम्मीद बनी है। 31 अगस्त को नई दिल्ली में हुए समझौते के अनुसार झारखंड को दो मिलियन एकड़ फीट पानी मिलना है। अब क्षेत्र की निगाहें इस बात पर हैं कि आवंटित पानी को खेतों तक पहुंचाने की व्यवस्था किस तरह लागू होगी।
रिपोर्ट के मुताबिक, समझौते से गढ़वा के केतार, खरौंधी, भवनाथपुर, कांडी और मझिआंव तथा पलामू के हैदरनगर और मोहम्मदगंज प्रखंडों को सीधे लाभ मिलने की संभावना है। अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों को अभी समझौते के विस्तृत मसौदे का इंतजार है, इसलिए पानी पहुंचाने की अंतिम कार्ययोजना स्पष्ट नहीं हुई है।
फिलहाल दोनों जिलों को सोन नदी से जोड़ने के लिए पाइपलाइन परियोजनाओं पर काम चल रहा है। गढ़वा की सोन-कनहर पाइपलाइन परियोजना पर 1,276 करोड़ रुपये और पलामू की परियोजना पर करीब 900 करोड़ रुपये खर्च होने की जानकारी दी गई है। इन्हें दिसंबर 2026 तक पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है।
उपलब्ध विवरण के अनुसार, इन परियोजनाओं से गढ़वा में 22 हजार हेक्टेयर और पलामू में 48 हजार हेक्टेयर भूमि को सिंचाई सुविधा मिलने का अनुमान है। हालांकि नदी से मिले हिस्से का उपयोग पाइपलाइन, प्रस्तावित बांध या अन्य संरचनाओं के माध्यम से किस अनुपात में होगा, इसकी स्थिति विस्तृत योजना सामने आने के बाद ही साफ होगी।
इस मुद्दे की पृष्ठभूमि 1973 के बाणसागर समझौते से जुड़ी है। उस समय अविभाजित बिहार के लिए 7.75 मिलियन एकड़ फीट पानी निर्धारित था। वर्ष 2000 में झारखंड बनने के बाद दोनों राज्यों के बीच हिस्सेदारी को लेकर विवाद बना रहा, जिसे ताजा समझौते से समाप्त होने की बात कही गई है।
गढ़वा के कधवन क्षेत्र में जलाशय परियोजना की आधारशिला 1990 में रखी गई थी, लेकिन निर्माण शुरू नहीं हो सका। बाद में इसका नाम इंद्रपुरी जलाशय परियोजना हुआ और अलग-अलग वर्षों में रिपोर्ट तथा निर्माण प्रस्तावों पर चर्चा हुई। नए जल समझौते के बाद अब पाइपलाइन परियोजनाओं के क्रियान्वयन और पुरानी जलाशय योजना की दिशा पर स्थानीय लोगों, अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों की नजर रहेगी।