हजारीबाग जिले के इचाक प्रखंड के बनसटांड़ स्थित बुढ़िया माता मंदिर अपनी अनूठी पूजा परंपरा के लिए जाना जाता है। मंदिर में देवी की कोई प्रतिमा या पिंडी स्थापित नहीं है। यहां श्रद्धालु दीवार पर उभरी आकृति को माता का निराकार स्वरूप मानकर पूजा-अर्चना करते हैं। नवरात्र के दौरान मंदिर में विशेष अनुष्ठान होते हैं और दूर-दराज के क्षेत्रों से भी लोग पहुंचते हैं।
स्थानीय मान्यता के अनुसार, मंदिर की यह परंपरा दो सौ वर्षों से अधिक पुरानी है। सप्तमी के दिन दीवार पर दिखाई देने वाली आकृति पर सिंदूर और घी चढ़ाने की प्रथा है। श्रद्धालुओं का कहना है कि मंदिर में वर्षभर लोगों का आना लगा रहता है, जबकि नवरात्र में यहां धार्मिक गतिविधियां और बढ़ जाती हैं।
इस पूजा स्थल से जुड़ी एक लोककथा भी प्रचलित है। स्थानीय लोगों के मुताबिक, वर्ष 1668 में इचाक क्षेत्र में हैजा फैलने के दौरान एक वृद्ध महिला बाजार में दिखाई दी थीं। मान्यता है कि उन्होंने बीमारी से बचाव के लिए मिट्टी देकर उसे गांव से दूर रखने को कहा और इसके बाद वहां से गायब हो गईं।
लोककथा में आगे कहा जाता है कि समय बीतने के साथ बीमारी का असर कम हुआ और वृद्ध महिला द्वारा दी गई मिट्टी ने दीवार जैसा स्वरूप ले लिया। बाद में उसी स्थान पर पूजा की परंपरा शुरू हुई। इस कथा की ऐतिहासिक पुष्टि का विवरण उपलब्ध नहीं है, लेकिन स्थानीय आस्था में इसका विशेष स्थान बना हुआ है।
मंदिर आने वाले श्रद्धालु इसे मनोकामना और आशीर्वाद से जुड़ा धार्मिक स्थल मानते हैं। हजारीबाग के अलावा आसपास के राज्यों से भी लोगों के यहां पहुंचने की बात कही गई है। प्रतिमा के बजाय दीवार के निराकार स्वरूप की आराधना इस मंदिर को क्षेत्र के अन्य देवी स्थलों से अलग पहचान देती है।
नवरात्र के अवसर पर होने वाली विशेष पूजा इस पुरानी परंपरा को फिर केंद्र में लाती है। बनसटांड़ का यह मंदिर स्थानीय धार्मिक विश्वास, पीढ़ियों से चली आ रही मौखिक कथा और निराकार उपासना की परंपरा—तीनों को एक साथ दर्शाता है।