रांची में झारखंड हाईकोर्ट ने हिंदी साहित्य सम्मेलन, इलाहाबाद से प्राप्त शैक्षणिक प्रमाणपत्रों के आधार पर सेवा से हटाए गए पारा शिक्षकों को राहत दी है। जस्टिस दीपक रोशन की अदालत ने विभिन्न जिलों से संबंधित रिट याचिकाओं पर संयुक्त फैसला देते हुए शिक्षकों की सेवा जारी रखने का निर्देश दिया। अदालत ने उनकी सेवा रोकने से जुड़े आदेशों को भी निरस्त कर दिया।
फैसले के अनुसार, याचिकाकर्ताओं की नियुक्ति वर्ष 2003 से 2006 के बीच पारा शिक्षक के पद पर हुई थी। उस समय नियुक्ति के लिए न्यूनतम शैक्षणिक योग्यता मैट्रिक निर्धारित थी और संबंधित शिक्षक यह योग्यता रखते थे। सुनवाई के दौरान राज्य सरकार और झारखंड एजुकेशन प्रोजेक्ट काउंसिल की ओर से भी इस तथ्य पर विवाद नहीं किया गया।
बाद में एनसीटीई की आवश्यकताओं के अनुरूप पारा शिक्षकों को इंटरमीडिएट या समकक्ष योग्यता प्राप्त करने का समय दिया गया था। याचिकाकर्ताओं ने इसी प्रक्रिया में हिंदी साहित्य सम्मेलन, इलाहाबाद से जारी प्रमाणपत्र प्रस्तुत किए थे। इसके बाद प्रमाणपत्रों को आधार बनाकर उनकी सेवा और मानदेय पर कार्रवाई की गई थी।
अदालत ने वर्ष 2012 में दिए गए हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच के एक फैसले का उल्लेख किया। उस निर्णय में हिंदी साहित्य सम्मेलन, इलाहाबाद से प्राप्त इंटरमीडिएट प्रमाणपत्र को वैध माना गया था। संबंधित विभाग ने भी सितंबर 2012 में उस फैसले के अनुपालन में आदेश जारी किया था।
हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि राज्य की ओर से उद्धृत वर्ष 2021 का एक अन्य फैसला हिंदी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग के प्रमाणपत्र से संबंधित था। अदालत के अनुसार, वह मामला इलाहाबाद से जारी प्रमाणपत्रों के प्रकरण से अलग था, इसलिए उसके आधार पर इन शिक्षकों के खिलाफ कार्रवाई उचित नहीं थी।
अदालत ने झारखंड सहायक अध्यापक सेवा शर्त नियमावली, 2021 का उल्लेख करते हुए कहा कि सेवा समाप्त करना बड़ी सजा है और इसके लिए निर्धारित प्रक्रिया का पालन आवश्यक है। कोर्ट ने शिक्षकों को अब सहायक अध्यापक के रूप में सेवा में बनाए रखने, अगस्त 2024 से उनके काम की अवधि का मानदेय या वेतन देने और आगे नियमानुसार भुगतान जारी रखने का निर्देश दिया। पूरी कार्रवाई आठ सप्ताह में पूरी करने को कहा गया है।