रांची में झारखंड हाईकोर्ट ने वर्ष 1995 के रिश्वत मामले में हटिया रेलवे स्टेशन के तत्कालीन पार्सल क्लर्क काली शंकर धोबी की दोषसिद्धि बरकरार रखी है। हालांकि, तीन दशक से अधिक समय तक चली कानूनी प्रक्रिया, उनकी अधिक उम्र और स्वास्थ्य संबंधी परेशानियों को देखते हुए अदालत ने कारावास की अवधि कम कर दी।
यह मामला 27 अप्रैल 1995 का है। उस समय एक व्यक्ति अपनी मोटरसाइकिल समस्तीपुर भेजने के लिए हटिया रेलवे स्टेशन पर बुक कराने पहुंचा था। रेलवे का निर्धारित शुल्क 203 रुपये था। अभियोजन का आरोप था कि पार्सल क्लर्क ने बुकिंग का काम करने के बदले 100 रुपये मांगे। शिकायत के बाद सीबीआई ने कार्रवाई की और उन्हें रकम लेते हुए पकड़े जाने का आरोप लगाया गया।
मामला भ्रष्टाचार निरोधक कानून के तहत निचली अदालत पहुंचा। करीब नौ वर्ष बाद, 2004 में अदालत ने काली शंकर को दोषी ठहराया था। धारा 7 के अंतर्गत एक वर्ष और धारा 13(2) के तहत डेढ़ वर्ष के कठोर कारावास की सजा सुनाई गई थी। दोनों सजाओं को एक साथ चलाने का आदेश था। इसके बाद दोषी ने फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी।
हाईकोर्ट में बचाव पक्ष ने कहा कि काली शंकर अब 75 वर्ष से अधिक उम्र के हैं, उम्र से जुड़ी बीमारियों का सामना कर रहे हैं और यह उनका पहला अपराध है। पक्ष ने यह भी रखा कि घटना के बाद से मुकदमा तीन दशक से अधिक समय तक चला तथा इस दौरान उनकी सरकारी नौकरी भी चली गई।
जस्टिस प्रदीप श्रीवास्तव की अदालत ने कहा कि दोषसिद्धि में हस्तक्षेप का आधार नहीं है, लेकिन असाधारण रूप से लंबी न्यायिक प्रक्रिया सहित प्रस्तुत परिस्थितियों को सजा तय करते समय महत्व दिया जा सकता है। अदालत ने धारा 7 की सजा घटाकर छह महीने और धारा 13(2) की सजा घटाकर एक वर्ष का साधारण कारावास कर दिया। दोनों सजाएं साथ-साथ चलेंगी और निचली अदालत में जमा जुर्माना बरकरार रहेगा।
अदालत ने काली शंकर की जमानत रद्द करते हुए उन्हें दो महीने के भीतर आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया है। तय अवधि में आत्मसमर्पण नहीं करने पर उनके विरुद्ध कठोर कार्रवाई की जा सकती है। इस आदेश के साथ 1995 की घटना से जुड़ी अपील पर हाईकोर्ट का निर्णय सामने आया है।