रांची में झारखंड हाईकोर्ट ने वर्ष 1993 के एक रिश्वत मामले में दोषी की जेल की सजा कम कर दी है। मामला शिकायतकर्ता के भविष्य निधि के पैसे की प्रक्रिया आगे बढ़ाने के बदले 300 रुपये मांगने के आरोप से जुड़ा था। अदालत ने दोषसिद्धि के बाद सजा की अवधि पर अलग से विचार किया।
न्यायमूर्ति प्रदीप कुमार श्रीवास्तव की एकल पीठ ने भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 7 के तहत सुनाई गई सजा की समीक्षा की। अदालत के सामने यह तथ्य रखा गया कि अपीलकर्ता इस मामले में पहले ही एक माह और एक दिन जेल में रह चुका है।
सजा की अवधि तय करते समय हाईकोर्ट ने मुकदमे में लगे लंबे समय और मामले की परिस्थितियों को ध्यान में रखा। अदालत ने कहा कि घटना 1993 की है और अपीलकर्ता करीब तीन दशक तक मुकदमे की प्रक्रिया से गुजरा है। उसके खिलाफ पहले का कोई आपराधिक रिकॉर्ड नहीं होने की बात भी विचार में ली गई।
पीठ ने रिश्वत की कथित मांग में शामिल 300 रुपये की राशि तथा अब तक काटी गई जेल अवधि का भी उल्लेख किया। इन परिस्थितियों को एक साथ देखते हुए अदालत ने माना कि अपीलकर्ता पर्याप्त दंड भुगत चुका है। इसके बाद कारावास की अवधि को पहले बिताए गए एक माह और एक दिन तक सीमित कर दिया गया।
हालांकि, अदालत द्वारा निर्धारित जुर्माना चुकाने की शर्त बनी रहेगी। उपलब्ध विवरण के अनुसार, अपीलकर्ता की अस्थायी जमानत पांच हजार रुपये जमा करने की शर्त पर मंजूर हुई थी और वह यह रकम जमा कर चुका था। अदालत ने यह भी दर्ज किया कि उसकी ओर से कुल सात हजार रुपये का भुगतान किया गया है।
हाईकोर्ट का निर्णय मुख्य रूप से सजा की अवधि से संबंधित है। अदालत ने अपराध की परिस्थितियों, कार्यवाही में हुई असाधारण देरी, पूर्व आपराधिक रिकॉर्ड के अभाव और पहले काटी जा चुकी जेल अवधि के आधार पर राहत दी। इस तरह मामले में अतिरिक्त कारावास के स्थान पर पहले से भुगती गई अवधि को ही पर्याप्त माना गया।