कैबिनेट की मंजूरी के एक साल बाद भी झारखंड की तीन सांस्कृतिक अकादमियों का गठन लंबित

साहित्य, संगीत नाटक और ललित कला अकादमियों के अध्यक्ष, उपाध्यक्ष व कोषाध्यक्ष की योग्यता तय करने की प्रक्रिया अब भी जारी है।

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झारखंड में साहित्य, संगीत नाटक और ललित कला अकादमियों के गठन की प्रतीकात्मक तस्वीर

रांची में झारखंड की प्रस्तावित साहित्य, संगीत नाटक और ललित कला अकादमियों का गठन कैबिनेट की मंजूरी के एक वर्ष से अधिक समय बाद भी पूरा नहीं हो सका है। तीनों संस्थाओं के प्रमुख पदों पर नियुक्ति से पहले आवश्यक योग्यता निर्धारित करने की प्रक्रिया फिलहाल जारी है। इससे अकादमियों के अस्तित्व में आने की निश्चित समयसीमा स्पष्ट नहीं हो पाई है।

उपलब्ध जानकारी के अनुसार, प्रत्येक अकादमी में अलग-अलग अध्यक्ष, उपाध्यक्ष और कोषाध्यक्ष नियुक्त किए जाने हैं। इन पदों की अर्हता तय करने के लिए 10 सितंबर को एक समिति की बैठक हुई थी। इसमें मिले सुझावों पर तीनों क्षेत्रों के विशेषज्ञों के साथ दोबारा विचार किया जाएगा। योग्यता संबंधी प्रस्ताव पर सहमति बनने के बाद इसे राज्य सरकार के पास भेजा जाना है।

सरकार की अंतिम मंजूरी मिलने पर ही इन पदों के लिए विज्ञापन जारी करने और नियुक्ति प्रक्रिया आगे बढ़ाने का रास्ता खुलेगा। नियमावली के अनुसार अध्यक्ष के लिए 75 हजार रुपये, उपाध्यक्ष के लिए 50 हजार रुपये और कोषाध्यक्ष के लिए 25 हजार रुपये मासिक मानदेय प्रस्तावित है। इन पदों का कार्यकाल तीन वर्ष रखने का प्रावधान है।

तीनों अकादमियों में एक-एक पूर्णकालिक सचिव भी होगा। यह जिम्मेदारी उपसचिव स्तर के अधिकारी को दिए जाने की व्यवस्था है। हालांकि पदाधिकारियों की योग्यता पर अंतिम निर्णय अभी बाकी होने के कारण अकादमियों का प्रशासनिक ढांचा व्यवहार में लागू नहीं हुआ है।

अर्हता निर्धारण को लेकर हुई बैठक में पद्मश्री सम्मानित कलाकारों, नाटककारों और साहित्यकारों सहित विभिन्न क्षेत्रों के लोगों ने सुझाव दिए। कुछ प्रतिभागियों ने चयन व्यवस्था में जनजातीय और क्षेत्रीय भाषाओं को भी शामिल करने की आवश्यकता बताई। बैठक सांस्कृतिक निदेशालय के निदेशक की ओर से बुलाई गई थी।

झारखंड साहित्य अकादमी स्थापना संघर्ष समिति ने देरी पर निराशा जताते हुए प्रक्रिया शीघ्र पूरी करने की मांग की है। समिति का कहना है कि वह पिछले पांच वर्षों से सरकार के साथ संवाद कर रही है। राज्य गठन के 25 वर्ष बाद भी साहित्य, संगीत और कला से जुड़ी अकादमियों का इंतजार जारी रहने से लेखकों और कलाकारों में असंतोष है।