कोडरमा-गया रेलखंड की गुरपा-गझंडी घाटी में स्थित तीन ऐतिहासिक सुरंगों को आधुनिक मालगाड़ियों के अनुकूल बनाया गया है। सुरंगों की ऊंचाई और चौड़ाई बढ़ाए जाने के बाद इस मार्ग से बीओबीआरएम कोयला रैक का परिचालन संभव हो गया है। इस बदलाव का उद्देश्य धनबाद क्षेत्र से बिजली संयंत्रों तक कोयले की ढुलाई को अधिक तेज और सुविधाजनक बनाना है।
नई दिल्ली-हावड़ा ग्रैंड कॉर्ड मार्ग के इस पहाड़ी हिस्से में बनी तीनों सुरंगें करीब 120 वर्ष पुरानी हैं। रेलवे के दस्तावेजों के मुताबिक, इनका निर्माण 6 दिसंबर 1906 को पूरा हुआ था। पहली सुरंग 496 मीटर, दूसरी 454 मीटर और तीसरी 395 मीटर लंबी है। तीनों की कुल लंबाई 1,345 मीटर है और ये लगभग 22 किलोमीटर लंबे गुरपा-गझंडी घाट खंड का हिस्सा हैं।
पुरानी सुरंगों के आंतरिक आयाम आधुनिक बीओबीआरएम कोयला वैगनों के परिचालन में बाधा बन रहे थे। इसके समाधान के लिए पूर्व मध्य रेलवे ने आईआईटी (आईएसएम) धनबाद के तकनीकी सहयोग से सुरंगों का आकलन और पुनर्डिजाइन कराया। इसके बाद संरचनात्मक बदलाव करते हुए अंदर उपलब्ध ऊंचाई और चौड़ाई बढ़ाई गई। कार्य के दौरान सुरंगों की मजबूती और सुरक्षित रेल परिचालन को भी ध्यान में रखा गया।
पूर्व मध्य रेलवे के महाप्रबंधक छत्रसाल सिंह ने 24 जून को कोडरमा-गया रेलखंड के निरीक्षण के दौरान इसी मार्ग से बीओबीआरएम कोयला रैक को रवाना किया था। रेलवे का कहना है कि ऊर्जा की बढ़ती मांग के बीच बिजली संयंत्रों तक कम समय में अधिक कोयला पहुंचाने के लिए धनबाद मंडल में कई विकास कार्य किए जा रहे हैं।
सुरंगों के अनुकूल बनाए जाने से धनबाद के कोयला क्षेत्रों से बाढ़ और बरौनी स्थित एनटीपीसी बिजली संयंत्रों तक आपूर्ति में सुविधा होने की जानकारी दी गई है। धनबाद से बाढ़ तक कोयला परिवहन में लगभग 250 किलोमीटर की दूरी और करीब पांच घंटे का समय बचने का अनुमान है। इससे खाली वैगनों की वापसी तेज होने और उपलब्ध रैक का अधिक प्रभावी उपयोग हो सकने की उम्मीद है।
यह परियोजना पुराने रेल बुनियादी ढांचे को मौजूदा माल परिवहन की जरूरतों के अनुरूप ढालने का उदाहरण है। बदलाव से बड़े कोयला वैगनों के रास्ते में आने वाली तकनीकी बाधा दूर हुई है। इसके साथ ही कोडरमा होकर गुजरने वाले इस पहाड़ी रेलखंड की भूमिका कोयला आपूर्ति व्यवस्था में बढ़ने की संभावना है।