रांची में झारखंड सरकार ने केंद्र के खान एवं खनिज (विकास एवं विनियमन) संशोधन अधिनियम, 2026 को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने की तैयारी शुरू कर दी है। खान विभाग ने विधि विभाग की राय लेने के बाद संबंधित संचिका मुख्यमंत्री की मंजूरी के लिए भेजी थी। मंजूरी मिलने के बाद अब याचिका दाखिल करने की प्रक्रिया आगे बढ़ाई जा रही है।
राज्य सरकार अपने प्रस्तावित कानूनी कदम का प्रमुख आधार सुप्रीम कोर्ट के 2024 के फैसले को बना रही है। सरकार के अनुसार, इसी निर्णय के बाद झारखंड ने वर्ष 2024 में खनिजों पर सेस लगाकर उसकी वसूली शुरू की थी। उसका तर्क है कि संसद के नए संशोधन से अदालत के फैसले के आधार पर राज्यों को मिले अधिकार प्रभावित हो रहे हैं।
संशोधित कानून में राज्यों द्वारा खनिजों पर अतिरिक्त कर या सेस लगाने से जुड़े अधिकारों को सीमित किया गया है। इसे 18 अगस्त 2026 को राष्ट्रपति की मंजूरी मिली थी। झारखंड सरकार का कहना है कि उसने फिलहाल राज्य में इस संशोधन को लागू नहीं किया है और कोल इंडिया सहित संबंधित कंपनियां सेस का भुगतान कर रही हैं।
सरकार ने इस बदलाव से राज्य के राजस्व पर बड़ा असर पड़ने की आशंका व्यक्त की है। उसके अनुमान के मुताबिक, वित्तीय वर्ष 2026-27 में खनिज सेस से करीब 14 हजार करोड़ रुपये मिलने की संभावना थी। वित्त मंत्री राधाकृष्ण किशोर भी इतनी ही राशि के संभावित नुकसान की बात कह चुके हैं। सरकार का कहना है कि राजस्व घटने से विकास योजनाएं प्रभावित हो सकती हैं।
इस विवाद के साथ झारखंड ने कोयला कंपनियों पर अपने बकाये का विषय भी उठाया है। राज्य सरकार के अनुसार, विभिन्न कोयला कंपनियों के पास झारखंड की लगभग 1,36,042 करोड़ रुपये की राशि बकाया है। सरकार को आशंका है कि संशोधित कानून के कारण इस रकम की वसूली से जुड़े उसके दावे पर भी असर पड़ सकता है।
प्रस्तावित याचिका में सेस लगाने के अधिकार, पहले से की जा रही वसूली और कोयला कंपनियों पर बताए गए बकाये से जुड़े प्रश्न सुप्रीम कोर्ट के सामने रखे जाने की तैयारी है। मामला दाखिल होने के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि राज्य सरकार ने संशोधन के किन प्रावधानों को औपचारिक रूप से चुनौती दी है।