गोड्डा के कालीपीठ परिसर में अस्थायी तालाब बनाकर दुर्गा प्रतिमा का विसर्जन

पाण्डुबथान स्थित कालीपीठ मंदिर में विसर्जन स्थल को लेकर प्रशासन और प्रबंधन के बीच मतभेद के बाद परिसर में जेसीबी से तालाब बनाया गया। भारी सुरक्षा के बीच प्रतिमा विसर्जित की गई।

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गोड्डा के पाण्डुबथान स्थित कालीपीठ मंदिर परिसर में दुर्गा प्रतिमा विसर्जन की व्यवस्था

गोड्डा जिले के पाण्डुबथान स्थित कालीपीठ मंदिर परिसर में जेसीबी से अस्थायी तालाब बनाकर दुर्गा प्रतिमा का विसर्जन किया गया। विसर्जन स्थल को लेकर जिला प्रशासन और मंदिर प्रबंधन के बीच मतभेद बना हुआ था। इस दौरान बड़ी संख्या में लोग परिसर में मौजूद रहे और तीन थानों की पुलिस सुरक्षा व्यवस्था में तैनात रही।

कालीपीठ मंदिर में हर वर्ष की तरह इस बार भी दुर्गा प्रतिमा स्थापित की गई थी। इस साल प्रतिमा का आकार पहले की तुलना में बड़ा था। प्रतिमा विसर्जन के लिए मंदिर प्रबंधन ने प्रशासन से अनुमति मांगी थी। प्रारंभिक अनुमति के तहत अन्य पूजा पंडालों की तरह कालीपीठ की प्रतिमा को भी 17 अक्टूबर तक राज कचहरी तालाब में विसर्जित किया जाना था।

इसके बाद 18 अक्टूबर को जारी नए प्रशासनिक आदेश में कालीपीठ की प्रतिमा का विसर्जन पुरानी व्यवस्था के अनुसार उसी स्थान पर करने को कहा गया, जहां पहले तालाब था। इस बदलाव के बाद मंदिर प्रबंधन ने आपत्ति जताई और पहले दी गई अनुमति को वापस लेने के निर्णय पर सवाल उठाया।

मंदिर की संचालक वंदना दुबे के अनुसार, पुराने तालाब तक जाने वाला रास्ता खराब था। उन्होंने बड़ी प्रतिमा को वहां ले जाने के दौरान उसके खंडित होने की आशंका भी जताई। प्रबंधन का कहना था कि प्रशासन से अनुकूल निर्णय नहीं मिलने के बाद मंदिर परिसर में ही तालाब बनाने का विकल्प अपनाया गया।

इसके बाद जेसीबी की सहायता से परिसर में तालाब खोदा गया और उसमें पानी भरकर प्रतिमा का विसर्जन कराया गया। पूरी प्रक्रिया सुरक्षा बलों की मौजूदगी में संपन्न हुई। आयोजन स्थल पर लोगों की भीड़ को देखते हुए पुलिसकर्मी सतर्क रहे।

एसडीओ वैद्यनाथ उरांव के मुताबिक, उपायुक्त के पत्र के आधार पर विसर्जन से संबंधित आदेश दिया गया था। प्रशासन का पक्ष है कि अचानक मार्ग बदलने से कानून-व्यवस्था प्रभावित होने की आशंका को ध्यान में रखते हुए निर्धारित स्थल पर ही विसर्जन करने को कहा गया। परिसर में बनाए गए तालाब में विसर्जन पूरा होने के साथ तत्काल प्रक्रिया समाप्त हो गई, हालांकि स्थल परिवर्तन को लेकर प्रशासन और मंदिर प्रबंधन के अलग-अलग पक्ष सामने आए हैं।