जमशेदपुर के दुर्गापूजा पंडालों में पारंपरिक ढाक की गूंज उत्सव के माहौल को जीवंत बना रही है। डिमना रोड स्थित शिवशंकर दुर्गापूजा समिति के पंडाल में पश्चिम बंगाल के ढाकुरिया से आया कलाकारों का दल अपनी प्रस्तुतियां दे रहा है। दल के प्रमुख कलाकार बापी की थाप पूजा-अर्चना और सांस्कृतिक गतिविधियों के दौरान श्रद्धालुओं का ध्यान आकर्षित कर रही है।
दुर्गोत्सव में महाषष्ठी से महादशमी तक ढाक का विशेष महत्व रहता है। आरती और धुनुची नृत्य के समय इसकी लय से पंडाल का वातावरण उत्साहपूर्ण हो जाता है। मां दुर्गा की विदाई के अवसर पर भी ढाक की धुन समारोह का अहम हिस्सा बनती है। जमशेदपुर में बंगाल की इस परंपरा को स्थानीय श्रद्धालु लंबे समय से अपनाते आए हैं।
बापी के अनुसार, ढाक बजाने की कला उनकी टीम को भारत के बाहर भी पहचान दिला चुकी है। दल अमेरिका, कनाडा, फ्रांस और जापान में प्रस्तुतियां दे चुका है। जमशेदपुर में उनका प्रदर्शन केवल पेशेवर कार्यक्रम नहीं, बल्कि आस्था और पारंपरिक संस्कृति से जुड़ने का अवसर भी है।
ढाक आकार में बड़े ढोल जैसा पारंपरिक वाद्य है। कलाकार इसे रस्सी की सहायता से कंधे पर लटकाते हैं और विशेष लकड़ी की छड़ियों से बजाते हैं। ढाक बजाने वाले कलाकारों को ढाकी कहा जाता है। अलग-अलग ताल और गति के जरिए वे पूजा के विभिन्न अनुष्ठानों के अनुरूप वातावरण तैयार करते हैं।
शहर की कई बड़ी पूजा समितियां हर वर्ष पश्चिम बंगाल के विभिन्न इलाकों से ढाकी दलों को आमंत्रित करती हैं। कुछ कलाकार कई वर्षों से जमशेदपुर के पंडालों में आते रहे हैं। इन प्रस्तुतियों के माध्यम से बंगाल की सांस्कृतिक विरासत नई पीढ़ी और शहर के विविध समुदायों तक पहुंचती है।
बहुसांस्कृतिक पहचान वाले जमशेदपुर में ढाक, धुनुची नृत्य और पूजा अनुष्ठानों का मेल दुर्गोत्सव को अलग रंग देता है। सिंदूर खेला और प्रतिमा की विदाई तक ढाकी कलाकारों की भूमिका बनी रहती है। शिवशंकर दुर्गापूजा समिति के पंडाल में बापी की टीम इसी परंपरा को अपनी लय और प्रस्तुति के साथ आगे बढ़ा रही है।