झारखंड हाईकोर्ट ने यूरेनियम कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड की जादूगोड़ा इकाई में कार्यरत रही साइंटिफिक असिस्टेंट ग्रेड-1 थानुश्री नायक की बर्खास्तगी बरकरार रखी है। अदालत ने केंद्रीय औद्योगिक न्यायाधिकरण, धनबाद का वह आदेश रद्द कर दिया, जिसमें कर्मचारी को सेवा में बहाल करने के साथ बकाया वेतन और अन्य वित्तीय लाभ देने का निर्देश था।
मामला प्रयोगशाला में बर्न्ट लाइम के रासायनिक विश्लेषण से जुड़ा है। कर्मचारी को नमूनों की जांच रिपोर्ट तैयार कर सहायक अधीक्षक को भेजने की जिम्मेदारी दी गई थी। विभागीय जांच में आरोप लगाया गया था कि तीन दिसंबर 2007 से 18 अप्रैल 2008 के बीच करीब 60 से 65 प्रतिशत नमूनों की रिपोर्ट में बदलाव कर कैल्शियम ऑक्साइड की मात्रा वास्तविक परिणाम से अधिक दिखाई गई।
कंपनी के अनुसार, बर्न्ट लाइम की गुणवत्ता के आधार पर आपूर्तिकर्ता को भुगतान किया जाता था। हाईकोर्ट ने रिपोर्ट में जानबूझकर हेरफेर कर आपूर्तिकर्ता को अनुचित आर्थिक लाभ पहुंचाने और कंपनी को नुकसान में डालने के आरोप को गंभीर कदाचार माना। अदालत के अनुसार, ऐसी स्थिति में बर्खास्तगी की सजा को असंगत नहीं कहा जा सकता।
अदालत के समक्ष आए रिकॉर्ड के मुताबिक, 28 अप्रैल 2008 को मांगे गए स्पष्टीकरण के जवाब में कर्मचारी ने जांच परिणामों में बदलाव की बात स्वीकार करते हुए राहत मांगी थी। दो मई के एक अन्य पत्र में आपूर्तिकर्ता द्वारा परिणाम बदलने का अनुरोध किए जाने की बात कही गई थी। हालांकि, 19 मई को कर्मचारी ने आरोपों से इनकार करते हुए दावा किया कि दोनों पत्र दबाव में लिखवाए गए थे। विभागीय जांच में यह दलील स्वीकार नहीं हुई।
न्यायाधिकरण ने छह मार्च 2014 को विभागीय जांच को निष्पक्ष माना था, लेकिन 21 जनवरी 2015 के निर्णय में बर्खास्तगी रद्द कर दी थी। उसका मत था कि स्वीकारोक्ति वाले पत्र दबाव में लिखे गए और कंपनी को हुए नुकसान का ठोस प्रमाण नहीं था। यूसील ने इसी निर्णय को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।
हाईकोर्ट ने कहा कि औद्योगिक विवाद अधिनियम की धारा 11-ए न्यायाधिकरण को साक्ष्यों के पुनर्मूल्यांकन का अधिकार देती है, लेकिन इसका प्रयोग न्यायिक विवेक के साथ होना चाहिए। विभागीय जांच को निष्पक्ष मान लेने के बाद उसके निष्कर्ष पलटने के लिए ठोस आधार आवश्यक था। इसी आधार पर न्यायाधिकरण का आदेश निरस्त करते हुए कंपनी का बर्खास्तगी आदेश बहाल कर दिया गया।