झारखंड में पुलिस महानिदेशक की नियुक्ति के लिए बनाए गए राज्य सरकार के नियम सुप्रीम कोर्ट की समीक्षा के दायरे में आ गए हैं। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने कहा कि पहली नजर में ये नियम डीजीपी नियुक्ति पर शीर्ष अदालत के पुराने फैसले के अनुरूप नहीं दिखाई देते।
अदालत ने झारखंड सरकार को संबंधित प्रावधानों पर फिर से विचार करने के लिए एक सप्ताह का समय दिया है। पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि राज्य सरकार यदि नियमों में बदलाव नहीं करना चाहती है तो उसे अदालत के सामने मौजूदा व्यवस्था का बचाव करना होगा। इस निर्देश के बाद राज्य को अपने नियमों की समीक्षा कर अगला पक्ष रखना है।
विवाद आठ जनवरी 2025 को जारी ‘झारखंड डीजीपी चयन और नियुक्ति विनियमन, 2025’ से जुड़ा है। केंद्र सरकार ने इन नियमों को चुनौती देते हुए दावा किया है कि वे पुलिस प्रमुखों की नियुक्ति के संबंध में प्रकाश सिंह मामले में दिए गए सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुरूप नहीं हैं। केंद्र की आपत्ति पर ही शीर्ष अदालत मामले की सुनवाई कर रही है।
झारखंड सरकार की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने पीठ को बताया कि राज्य नियमों पर दोबारा विचार करेगा। दूसरी ओर, सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत में कहा कि केंद्र पहले भी राज्य सरकार को अपनी आपत्तियों से अवगत करा चुका है और उसकी राय में इन नियमों को बरकरार नहीं रखा जा सकता।
सुनवाई में वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी तदाशा मिश्रा की स्थिति पर भी विचार हुआ। अदालत ने माना कि नियम रद्द किए जाने की स्थिति में वह प्रभावित हो सकती हैं। इसी कारण पीठ ने उन्हें भी अपना पक्ष रखने का अवसर दिया है। फिलहाल अदालत ने नियमों या नियुक्ति की वैधता पर अंतिम निर्णय नहीं सुनाया है।
सॉलिसिटर जनरल ने यह भी कहा कि यदि किसी अन्य राज्य ने इसी प्रकार के नियम बनाए हैं तो वहां सत्ता में कोई भी दल हो, उनकी भी समीक्षा होनी चाहिए। अब मामले की अगली दिशा झारखंड सरकार के पुनर्विचार और अदालत में पेश किए जाने वाले उसके जवाब पर निर्भर करेगी।