रांची स्थित नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ स्टडी एंड रिसर्च इन लॉ (एनयूएसआरएल) के सहयोग से झारखंड के पारंपरिक वाद्य यंत्र मांदर को भौगोलिक संकेतक यानी जीआई पंजीकरण मिला है। इसे राज्य की सांस्कृतिक विरासत और मांदर निर्माण से जुड़े पारंपरिक समुदायों की विशिष्ट पहचान के संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जा रहा है।
मांदर झारखंड के लोकसंगीत, सामुदायिक जीवन और पारंपरिक आयोजनों का अभिन्न हिस्सा है। इसके जीआई पंजीकरण के लिए आवेदन संख्या 777 रायडीह मांदर प्रोड्यूसर कंपनी लिमिटेड के नाम से 24 सितंबर 2021 को दाखिल किया गया था। इस प्रक्रिया में एनयूएसआरएल ने शोध, दस्तावेज तैयार करने, संबंधित पक्षों के बीच समन्वय और जीआई रजिस्ट्री से जुड़ी प्रक्रियाओं में सहयोग किया।
उपलब्ध विवरण के अनुसार, विश्वविद्यालय की डीपीआईआईटी आईपीआर चेयर पारंपरिक उत्पादों और कलाओं को बौद्धिक संपदा अधिकारों के माध्यम से संरक्षण दिलाने पर काम कर रही है। जीआई व्यवस्था किसी उत्पाद के विशेष भौगोलिक क्षेत्र, स्थानीय परंपरा और उत्पादन से जुड़े समुदाय के संबंध को मान्यता देती है। इससे उत्पाद की विशिष्ट पहचान के प्रति जागरूकता बढ़ने की संभावना रहती है।
मांदर के बाद एनयूएसआरएल पूर्वी सिंहभूम की पैटकर पेंटिंग के जीआई आवेदन पर भी अनुसंधान और कानूनी अनुवर्ती कार्रवाई कर रहा है। पैटकर पेंटिंग ऑफ ईस्ट सिंहभूम के लिए आवेदन संख्या 712 नौ अक्टूबर 2020 को दाखिल की गई थी। इस कला की पारंपरिक विशेषताओं, भौगोलिक संबंध और कलाकार समुदाय के योगदान का दस्तावेजीकरण प्रक्रिया का प्रमुख हिस्सा है।
विश्वविद्यालय देवघर की पहचान से जुड़े पारंपरिक खाद्य उत्पाद देवघर पेड़ा के आवेदन में भी सहयोग कर रहा है। इसके लिए आवेदन संख्या 1043 दस जनवरी 2023 को दाखिल हुई थी। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, यह आवेदन अभी जीआई परीक्षण और पंजीकरण की प्रक्रियाओं के अधीन है तथा आवश्यक शोध, दस्तावेजीकरण और प्रक्रियागत कार्रवाई जारी है।
इन प्रयासों का उद्देश्य झारखंड के पारंपरिक उत्पादों को उनकी भौगोलिक और सांस्कृतिक पहचान के अनुरूप कानूनी संरक्षण दिलाने में सहायता करना है। मांदर का पंजीकरण पूरा हो चुका है, जबकि पैटकर पेंटिंग और देवघर पेड़ा के मामलों में आवेदन संबंधी प्रक्रिया चल रही है; इसलिए दोनों उत्पादों को अभी जीआई पंजीकरण प्राप्त मानना उचित नहीं होगा।