रांची में सामने आए केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के राष्ट्रीय कुष्ठ रोग उन्मूलन कार्यक्रम (एनएलईपी) 2025-26 के आंकड़ों के अनुसार, झारखंड में एक वर्ष के दौरान बच्चों में कुष्ठ के 416 नए मामले दर्ज किए गए। इनमें पांच बच्चों में बीमारी की पहचान होने तक ग्रेड-2 दिव्यांगता विकसित हो चुकी थी। यह स्थिति रोग की समय पर पहचान की जरूरत को रेखांकित करती है।
रिपोर्ट के मुताबिक, इसी अवधि में देशभर में बच्चों के बीच कुष्ठ के 3,832 नए मामले मिले। इनमें 37 बच्चे बीमारी का पता चलने के समय ग्रेड-2 दिव्यांगता की स्थिति में थे। देश में दर्ज बाल मामलों में झारखंड की हिस्सेदारी लगभग 11 प्रतिशत रही। राष्ट्रीय कार्यक्रम में वर्ष के लिए बच्चों के दो हजार मामलों का लक्ष्य रखा गया था, लेकिन दर्ज संख्या उससे 91.6 प्रतिशत अधिक रही।
झारखंड में सभी आयु वर्ग को मिलाकर 2025-26 के दौरान कुष्ठ के 6,385 नए मरीज चिह्नित किए गए। कुल मरीजों में बच्चों की हिस्सेदारी 6.06 प्रतिशत रही। राज्य में मिले मरीजों में 386 ग्रेड-1 और 169 ग्रेड-2 दिव्यांगता के स्तर तक पहुंच चुके थे।
आंकड़ों के अनुसार, झारखंड के कुल मामलों में ग्रेड-1 दिव्यांगता की हिस्सेदारी 5.64 प्रतिशत और ग्रेड-2 की हिस्सेदारी 2.46 प्रतिशत रही। दोनों आंकड़े क्रमशः 5.45 प्रतिशत और 2.12 प्रतिशत के राष्ट्रीय औसत से अधिक हैं। समय पर रोग की पहचान और उपचार से मरीजों को दिव्यांगता तक पहुंचने से बचाया जा सकता है।
राज्य में कुष्ठ की व्यापकता दर प्रति दस हजार आबादी पर 1.51 दर्ज की गई, जबकि राष्ट्रीय दर 0.56 है। केंद्रीय रोडमैप के तहत इस दर को प्रति दस हजार आबादी पर एक से नीचे लाने का लक्ष्य रखा गया है। झारखंड की मौजूदा दर राष्ट्रीय स्तर के मुकाबले दोगुनी से भी अधिक है।
नए मामलों की वार्षिक पहचान दर में भी बड़ा अंतर दर्ज हुआ। झारखंड में यह दर प्रति एक लाख आबादी पर 16.19 रही, जबकि राष्ट्रीय स्तर पर 6.31 दर्ज की गई। राष्ट्रीय रणनीतिक योजना 2023-27 का उद्देश्य वर्ष 2027 तक जिला स्तर पर कुष्ठ संक्रमण रोकना है। राज्य के आंकड़े समय रहते पहचान, जांच और उपचार की पहुंच मजबूत करने की आवश्यकता बताते हैं।