रांची: झारखंड में स्कूल से बाहर हो चुके बच्चों की पहचान कर उन्हें दोबारा पढ़ाई से जोड़ने के लिए पंचायत आधारित व्यवस्था तैयार की जा रही है। जीरो पंचायत ड्रॉपआउट योजना के तहत 6 से 18 वर्ष आयु वर्ग के प्रत्येक बच्चे का विद्यालय में नामांकन कराने के साथ उसकी नियमित उपस्थिति सुनिश्चित करने का लक्ष्य रखा गया है। पंचायत को इकाई मानकर बच्चों की शैक्षणिक स्थिति दर्ज करने और उनकी वापसी के उपाय तय करने की तैयारी है।
योजना में स्कूल के दिनों के दौरान लगातार 30 दिन अनुपस्थित रहने वाले बच्चे को ड्रॉपआउट की श्रेणी में माना जाएगा। पहचान होने के बाद यह पता लगाया जाएगा कि बच्चे ने विद्यालय जाना क्यों छोड़ा। उसकी परिस्थितियों के अनुसार दोबारा नामांकन और पढ़ाई जारी रखने की प्रक्रिया शुरू की जाएगी। निगरानी केवल प्रवेश तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि यह भी देखा जाएगा कि बच्चा नियमित रूप से कक्षा में उपस्थित हो रहा है या नहीं।
किसी पंचायत में 6 से 18 वर्ष का कोई बच्चा स्कूल से बाहर नहीं रहने और सभी बच्चों की नियमित उपस्थिति सुनिश्चित होने पर उसे जीरो ड्रॉपआउट पंचायत घोषित करने की प्रक्रिया आगे बढ़ेगी। पहले मुखिया प्रमाणपत्र देंगे। इसके बाद जिला शिक्षा अधीक्षक और जिला शिक्षा पदाधिकारी जांच करेंगे तथा उपायुक्त के अंतिम सत्यापन के आधार पर प्रमाणन होगा।
पहले चरण में झारखंड के प्रत्येक जिले की पांच-पांच पंचायतों को इस मॉडल के तहत विकसित करने की तैयारी है। इन पंचायतों में मिले अनुभव के आधार पर व्यवस्था का विस्तार अन्य क्षेत्रों में किया जा सकता है। बच्चों की वास्तविक स्थिति जानने के लिए घर-घर सर्वेक्षण का सहारा लिया जा रहा है। सर्वे की निगरानी में लापरवाही को लेकर शिक्षा विभाग ने हाल में 2,470 शिक्षकों और 56 अधिकारियों से स्पष्टीकरण मांगा है तथा जवाब नहीं मिलने पर वेतन रोकने की चेतावनी दी है।
लंबे समय से औपचारिक शिक्षा से बाहर 14 से 18 वर्ष के किशोरों के लिए राष्ट्रीय मुक्त विद्यालयी शिक्षा संस्थान के माध्यम से ओपन स्कूलिंग का विकल्प देने की योजना है। उन्हें कौशल विकास से जोड़ने की भी कोशिश होगी। कम उम्र में पढ़ाई छोड़ चुके बच्चों को उनकी आयु के अनुरूप कक्षा के लिए तैयार करने में सेतु पाठ्यक्रम, सेतु गाइड केंद्र और आवासीय ब्रिज कोर्स की सहायता ली जाएगी।
इस पहल के सामने विद्यालयों के संसाधनों से जुड़ी चुनौतियां भी हैं। राज्य में नौ हजार से अधिक एकल-शिक्षक विद्यालय होने और लगभग 99,565 शिक्षक पद रिक्त रहने की जानकारी सामने आई है। ऐसे में योजना की सफलता बच्चों की सही पहचान, उनकी वापसी और पंचायत से जिला स्तर तक नियमित उपस्थिति की प्रभावी निगरानी पर निर्भर करेगी।