झारखंड हाईकोर्ट ने जेयूवीएनएल के संविदा चालकों को नियमित करने का दिया आदेश

हाईकोर्ट ने करीब 15 वर्षों से लगातार कार्यरत चालकों के नियमितीकरण का निर्देश देते हुए पद स्वीकृत नहीं होने और सेवा अवधि से जुड़ी निगम की दलीलें स्वीकार नहीं कीं।

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झारखंड हाईकोर्ट की इमारत का दृश्य

रांची में झारखंड हाईकोर्ट ने झारखंड ऊर्जा विकास निगम लिमिटेड (जेयूवीएनएल) और उसकी सहयोगी कंपनियों में लंबे समय से संविदा पर कार्यरत चालकों को नियमित करने का आदेश दिया है। जस्टिस दीपक रोशन की अदालत ने संबंधित कर्मचारियों को नियमितीकरण के आधार पर मिलने वाले सभी लाभ देने का भी निर्देश दिया। ये चालक करीब 15 वर्षों से लगातार सेवा दे रहे हैं।

यह आदेश इंद्रदेव सिंह समेत कई चालकों की अलग-अलग याचिकाओं पर सुनवाई के बाद आया। सभी मामलों में मुद्दा समान होने के कारण अदालत ने उनकी एक साथ सुनवाई की। याचिकाकर्ताओं ने कहा था कि उन्हें शुरुआत में आउटसोर्सिंग एजेंसी के माध्यम से चालक के रूप में रखा गया और बाद में निगम ने संविदा के आधार पर उनकी सेवाएं लीं।

अदालत के सामने रखे गए विवरण के अनुसार, वर्ष 2008 में चयन प्रक्रिया के बाद 22 चालकों को संविदा पर नियुक्त किया गया था। वे इसके बाद से लगातार काम कर रहे हैं। कर्मचारियों ने दलील दी कि जेयूवीएनएल ने वर्ष 2015 में संविदा और अस्थायी कर्मचारियों के नियमितीकरण के लिए नियम बनाए, लेकिन उनके मामलों पर कोई ठोस निर्णय नहीं लिया गया।

याचिकाकर्ताओं ने यह भी बताया कि समान परिस्थितियों में कार्यरत कुछ कर्मचारियों को पहले ही नियमित किया जा चुका है। दूसरी ओर, निगम ने कहा कि संबंधित चालकों के पद स्वीकृत नहीं थे और वे नियमितीकरण के लिए निर्धारित दस वर्ष की सेवा की शर्त पूरी नहीं करते थे।

हाईकोर्ट ने निगम की इन दलीलों को स्वीकार नहीं किया। अदालत ने कहा कि कर्मचारी अब भी काम कर रहे हैं, इसलिए दस वर्ष की सेवा पूरी नहीं होने का आधार प्रभावी नहीं रह जाता। कोर्ट के अनुसार, केवल पद स्वीकृत नहीं होने के कारण भी लंबे समय से सेवा दे रहे कर्मचारियों के नियमितीकरण से इनकार नहीं किया जा सकता।

अदालत ने यह भी माना कि लगातार काम कर रहे और आवश्यक योग्यता रखने वाले कर्मचारियों की नियुक्ति को अधिक से अधिक अनियमित कहा जा सकता है, अवैध नहीं। फैसले में कहा गया कि आवश्यक सरकारी कार्य लंबे समय तक करने वाले कर्मचारियों की सेवा को केवल संविदा या अस्थायी नियुक्ति का नाम देकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।