रांची में झारखंड हाईकोर्ट ने जमीन की रजिस्ट्री से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में राज्य सरकार को नेशनल जेनरिक डॉक्यूमेंट रजिस्ट्रेशन सिस्टम (NGDRS) पोर्टल से प्रतिबंधित जमीनों की सूची तत्काल हटाने का निर्देश दिया है। जस्टिस राजेश शंकर की अदालत ने कहा कि निर्धारित कानूनी और प्रक्रियागत शर्तें पूरी करने वाले दस्तावेजों की रजिस्ट्री से सब-रजिस्ट्रार इनकार नहीं कर सकते।
अदालत ने राजस्व, निबंधन एवं भूमि सुधार विभाग के सचिव को राज्य के सभी उपायुक्तों के लिए आवश्यक सर्कुलर जारी करने को भी कहा है। आदेश के अनुसार, दस्तावेज रजिस्ट्रेशन एक्ट, 1908 और बिहार रजिस्ट्रेशन रूल्स, 1937 की शर्तों के अनुरूप हों तथा जरूरी स्टांप और निबंधन शुल्क जमा हो, तो उनका निबंधन किया जाना चाहिए।
यह आदेश अमित रंजन की रिट याचिका पर सुनवाई के बाद दिया गया। याचिका में हजारीबाग जिले के बोंगा गांव की खाता संख्या 154 और प्लॉट संख्या 2606 में स्थित 42 डिसमिल जमीन को प्रतिबंधित सूची से हटाने की मांग की गई थी। याचिकाकर्ता का पक्ष था कि उपायुक्त के समक्ष आवेदन देने के बाद भी इस दिशा में कार्रवाई नहीं हुई।
सुनवाई के दौरान पूर्व के न्यायिक फैसलों का उल्लेख किया गया। अदालत ने कहा कि हाईकोर्ट की खंडपीठ रजिस्ट्रेशन एक्ट की धारा 22-ए और 26 अगस्त 2015 की संबंधित अधिसूचना को पहले ही निरस्त कर चुकी है। राज्य सरकार ने बताया कि उस फैसले के विरुद्ध सुप्रीम कोर्ट में दो विशेष अनुमति याचिकाएं दायर हैं, लेकिन उनमें अभी कोई अंतरिम रोक नहीं लगी है।
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि नया वैधानिक प्रावधान लागू होने तक निरस्त कानून या अधिसूचना के आधार पर कार्रवाई नहीं की जा सकती। अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि रजिस्ट्रेशन अधिकारी का दायित्व दस्तावेज का निबंधन करना है, जमीन के मालिकाना अधिकार का अंतिम निर्णय करना नहीं। हालांकि, केवल रजिस्ट्री हो जाने से स्वामित्व की वैधता स्वतः प्रमाणित नहीं होगी।
अदालत के अनुसार, प्रभावित पक्ष को सुनवाई का अवसर दिए बिना जमीन को प्रतिबंधित सूची में डालना गंभीर नागरिक परिणाम पैदा करता है। ऐसे मामलों में प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन जरूरी है। आदेश से अब पोर्टल पर सूची हटाने, योग्य दस्तावेजों का निबंधन सुनिश्चित करने और जिलों को स्पष्ट प्रशासनिक निर्देश भेजने की जिम्मेदारी राज्य सरकार पर होगी।