रांची में झारखंड हाई कोर्ट ने राज्य की जेलों के स्वीकृत स्थायी पदों पर आउटसोर्सिंग के माध्यम से कर्मियों से काम लेने की व्यवस्था को मनमाना और असंवैधानिक करार दिया है। जस्टिस दीपक रोशन की अदालत ने राज्य सरकार के 23 नवंबर 2021 के उस आदेश को निरस्त कर दिया, जिसके तहत दैनिक वेतनभोगी और अन्य कर्मियों को आउटसोर्सिंग व्यवस्था के अधीन करने का निर्देश दिया गया था।
अदालत ने सरकार को दस वर्ष से अधिक समय से कार्यरत संबंधित कर्मियों की सेवाएं नियमित करने की प्रक्रिया आठ सप्ताह के भीतर पूरी करने का निर्देश दिया। नियमितीकरण होने तक इन कर्मियों को 23 नवंबर 2021 से पहले मिल रहे वेतन या मजदूरी के अनुरूप भुगतान जारी रखने को कहा गया है।
फैसले में भविष्य की नियुक्तियों को लेकर भी स्थिति स्पष्ट की गई है। अदालत ने कहा कि सरकार की ओर से स्थायी रूप से स्वीकृत किसी पद पर अब आउटसोर्सिंग के जरिए व्यक्ति नियुक्त नहीं किया जाएगा। ऐसे पदों को भरने के लिए निर्धारित नियमित नियुक्ति प्रक्रिया का पालन करना होगा और आउटसोर्सिंग को उसके विकल्प के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।
यह आदेश लक्ष्मीकांत गुइन सहित 19 याचिकाओं की सुनवाई के बाद आया। याचिकाकर्ताओं में रांची, हजारीबाग, लातेहार, लोहरदगा, रामगढ़ और बोकारो की जेलों में लंबे समय से दैनिक वेतनभोगी तथा अन्य पदों पर काम कर रहे कर्मी शामिल हैं। अदालत के समक्ष यह तथ्य रखा गया कि वे वर्षों से स्वीकृत पदों पर सेवाएं दे रहे थे, लेकिन बाद में उनकी कार्य व्यवस्था आउटसोर्सिंग के अधीन कर दी गई।
हाई कोर्ट ने निर्णय लेने की सरकारी प्रक्रिया पर भी सवाल उठाया। अदालत के अनुसार, संबंधित फैसला किए जाने के समय राज्य में आउटसोर्सिंग को लेकर कोई स्पष्ट नीतिगत व्यवस्था नहीं थी। उसने यह भी देखा कि समान प्रकृति के 183 कर्मियों को तीन मार्च 2021 के सरकारी प्रस्ताव के तहत पहले ही नियमित किया जा चुका था।
अदालत ने समान परिस्थितियों में काम करने वाले याचिकाकर्ताओं के साथ अलग व्यवहार का ठोस आधार नहीं पाया। फैसले में नरेंद्र कुमार तिवारी बनाम झारखंड सरकार मामले में सुप्रीम कोर्ट के निर्णय का उल्लेख करते हुए दोहराया गया कि स्वीकृत पदों पर नियुक्ति के लिए नियमित प्रक्रिया ही अपनाई जानी चाहिए।