रांची स्थित झारखंड हाई कोर्ट ने कहा है कि ट्रेन दुर्घटना में किसी यात्री की मृत्यु के बाद शव के पास रेलवे टिकट नहीं मिलना मात्र मुआवजे का दावा खारिज करने का आधार नहीं हो सकता। जस्टिस एसके द्विवेदी की अदालत ने रेलवे दावा अधिकरण का पूर्व आदेश निरस्त करते हुए मृतक बनमाली गोप के परिजनों को आठ लाख रुपये मुआवजा देने का निर्देश दिया है।
मामला एक सितंबर 2017 की घटना से जुड़ा है। परिजनों के अनुसार, बनमाली गोप झींकपानी रेलवे स्टेशन से टाटा-बड़बिल पैसेंजर ट्रेन में सवार हुए थे और उन्हें केंदपोसी जाना था। उनका दावा था कि भीड़ के बीच केंदपोसी स्टेशन के पास यात्रियों के दरवाजे की ओर बढ़ने और ट्रेन में झटका लगने के दौरान बनमाली संतुलन खोकर नीचे गिर गए। हादसे में उनकी मृत्यु हो गई थी।
परिजनों ने इसके बाद आठ लाख रुपये मुआवजे का दावा किया था। रेलवे दावा अधिकरण ने 12 सितंबर 2023 को टिकट उपलब्ध नहीं होने के आधार पर आवेदन खारिज कर दिया। इस निर्णय के विरुद्ध मृतक के परिजनों ने हाई कोर्ट में अपील दायर की थी।
सुनवाई के दौरान अदालत ने पोस्टमार्टम रिपोर्ट, स्टेशन प्रबंधक के पत्र और गवाह के बयान पर विचार किया। उपलब्ध विवरण के मुताबिक, पोस्टमार्टम रिपोर्ट में ट्रेन दुर्घटना से आई गंभीर चोटों का उल्लेख था, जबकि स्टेशन प्रबंधक के पत्र में रात करीब 8:25 बजे रेलवे लाइन के पास शव मिलने की सूचना दर्ज थी। मृतक के भाई ने भी टिकट खरीदे जाने की बात कही थी, जिसे रेलवे की ओर से चुनौती नहीं दी गई।
अदालत ने यह भी दर्ज किया कि रेलवे ने घटना से संबंधित मंडल रेल प्रबंधक की जांच रिपोर्ट पेश नहीं की। हाई कोर्ट के अनुसार, मुआवजे से जुड़े प्रावधानों को उदार दृष्टि से समझा जाना चाहिए, ताकि दुर्घटना प्रभावित परिवार केवल तकनीकी कारणों से राहत से वंचित न हों।
हाई कोर्ट ने अधिकरण का फैसला रद्द कर रेलवे को आठ लाख रुपये देने का आदेश दिया। इसके साथ दावा आवेदन दाखिल किए जाने की तारीख से मुआवजे का आदेश होने तक छह प्रतिशत वार्षिक ब्याज देने का भी निर्देश दिया गया है। यह आदेश दुर्घटना संबंधी दावों में उपलब्ध साक्ष्यों के समग्र मूल्यांकन की आवश्यकता को रेखांकित करता है।