डीएसपीएमयू और दिल्ली विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों के पौध-अर्क उपकरण को यूके में डिजाइन रजिस्ट्रेशन

रांची के डीएसपीएमयू के डॉ अशोक कुमार नाग और दिल्ली विश्वविद्यालय की डॉ अंजना सागर ने औषधीय पौधों से जैव-सक्रिय यौगिक निकालने वाला प्रयोगशाला उपकरण विकसित किया है।

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औषधीय पौधों से जैव-सक्रिय यौगिक निकालने वाले उपकरण पर शोध करते वैज्ञानिक

रांची स्थित डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी विश्वविद्यालय के वनस्पतिशास्त्र विभाग के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ अशोक कुमार नाग और दिल्ली विश्वविद्यालय की वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ अंजना सागर के संयुक्त अनुसंधान को यूनाइटेड किंगडम में डिजाइन रजिस्ट्रेशन मिला है। दोनों वैज्ञानिकों ने औषधीय पौधों से उपयोगी जैव-सक्रिय यौगिक अलग करने के लिए एक प्रयोगशाला उपकरण विकसित किया है।

उपकरण का नाम “ए फाइटोकेमिकल एक्सट्रैक्शन अपरेटस फॉर आइसोलेशन ऑफ बायोएक्टिव कंपाउंड्स” बताया गया है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, यूके सरकार के इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी ऑफिस ने इसके डिजाइन का पंजीकरण किया है। इसे पौधों से यौगिक निकालने की प्रक्रिया तेज, अधिक शुद्ध और कम लागत वाली बनाने के उद्देश्य से तैयार किया गया है।

डॉ नाग पिछले करीब एक दशक से झारखंड के जंगलों में पाए जाने वाले 66 प्रमुख वृक्षों, लताओं और पारंपरिक रूप से इस्तेमाल होने वाले औषधीय पौधों पर शोध कर रहे हैं। इनमें साल, महुआ, केंदू, बिजासाल, चिरोंजी और आंवला जैसे पेड़ शामिल हैं। नया उपकरण इनके बीजों और पत्तियों से अर्क निकालने के शोध में उपयोगी हो सकता है।

वैज्ञानिकों का कहना है कि इस तकनीक से गांवों में ही वन उपज का अर्क तैयार करने की संभावनाएं बढ़ सकती हैं। उनके अनुसार, आगे चलकर वन-धन केंद्रों और स्वयं सहायता समूहों को इससे लाभ मिलने तथा स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर बनने की गुंजाइश है। हालांकि उत्पादन, निवेश और रोजगार से जुड़े ये लक्ष्य अभी भावी योजनाओं का हिस्सा हैं।

डीएसपीएमयू में उपकरण से संबंधित पायलट प्लांट लगाने की योजना भी बताई गई है। दोनों संस्थानों की ओर से दो स्टार्टअप, तीन पीएचडी शोध और बीआईआरएसी तथा स्टार्टअप इंडिया से वित्तीय सहायता के लिए प्रस्ताव तैयार किए जाने की जानकारी दी गई है।

शोधकर्ताओं का अगला लक्ष्य डिजाइन का अमेरिका और यूरोपीय संघ में भी पंजीकरण कराना तथा उपकरण को डब्ल्यूएचओ-जीएमपी मानकों के अनुरूप विकसित करना है। वैज्ञानिकों ने उम्मीद जताई है कि आगे के शोध और परीक्षण सफल रहने पर यह तकनीक औषधीय पौधों पर अध्ययन तथा कम लागत वाली दवाओं के विकास में सहायक बन सकती है।