गढ़वा जिले के डंडई प्रखंड में दीपावली नजदीक आते ही कुम्हार परिवारों का काम तेज हो गया है। सुअरजंघा, रारो, लवाही और सोनेहरा गांवों में कारीगर त्योहार से पहले मिट्टी के पर्याप्त दीये तैयार कर बाजार तक पहुंचाने की कोशिश में जुटे हैं। घरों और काम की जगहों पर चाक चलने के साथ दीये सुखाने तथा व्यवस्थित करने का काम भी किया जा रहा है।
दीया तैयार करने की पूरी प्रक्रिया में परिवार के अलग-अलग सदस्य सहयोग कर रहे हैं। पुरुष चाक पर मिट्टी को आकार दे रहे हैं, जबकि महिलाएं और बच्चे बने हुए दीयों को धूप में सुखाने और संभालकर रखने में हाथ बंटा रहे हैं। मिट्टी लाने, उसे गूंथने, आकार देने और पकाने तक के सभी चरण परिवार मिलकर पूरे कर रहे हैं।
पिछले दो दिनों की बारिश ने इस तैयारी में परेशानी बढ़ाई है। पर्याप्त धूप नहीं मिलने के कारण कच्चे दीयों को सुखाने में अधिक समय लग रहा है और इसके चलते उन्हें पकाने का काम भी प्रभावित हुआ है। कारीगरों को उम्मीद है कि मौसम साफ रहने पर दीपावली से पहले तैयारी पूरी की जा सकेगी।
त्योहार का समय इन परिवारों के लिए विशेष महत्व रखता है। दीपावली पर होने वाली बिक्री से घरेलू जरूरतें पूरी करने में सहायता मिलती है, इसलिए कई परिवार दूसरे काम छोड़कर दीया निर्माण पर ध्यान दे रहे हैं। हालांकि, बढ़ती लागत के बीच उनके लिए पर्याप्त मुनाफा हासिल करना कठिन हो रहा है।
कारीगरों के सामने बाजार की बदलती पसंद भी एक चुनौती है। रंग-बिरंगी बिजली की झालरों और मोमबत्तियों का इस्तेमाल बढ़ने से मिट्टी के दीयों की मांग पहले जैसी नहीं रही। इसका असर पारंपरिक कारीगरी से जुड़े परिवारों की आय पर भी पड़ा है।
इन चुनौतियों के बावजूद गांवों में दीया बनाने की परंपरा जारी है। कुम्हार परिवारों का मानना है कि धार्मिक और पारंपरिक उपयोग के कारण मिट्टी के दीयों की अलग पहचान बनी हुई है। परिवार के बुजुर्गों के साथ युवा सदस्य भी काम में शामिल होकर इस कला को आगे बढ़ा रहे हैं।