दुमका के मलूटी में काली पूजा की तैयारी तेज, लुची-माछेर झोल की परंपरा रहेगी खास

शिकारीपाड़ा के ऐतिहासिक मलूटी गांव में प्रतिमाओं, पंडालों और मेले की तैयारियां अंतिम चरण में हैं। पूजा की रात यहां घरों में चावल नहीं बनाने की पुरानी परंपरा निभाई जाती है।

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दुमका के मलूटी गांव में काली पूजा के लिए तैयार की जा रही प्रतिमा

दुमका जिले के शिकारीपाड़ा प्रखंड स्थित ऐतिहासिक मलूटी गांव में काली पूजा की तैयारियां तेज हो गई हैं। 108 मंदिरों के लिए प्रसिद्ध इस गांव में शिल्पकार प्रतिमाओं को अंतिम रूप दे रहे हैं। पूजा के लिए पंडाल और मेले में लगने वाली दुकानों का निर्माण भी अंतिम चरण में है।

मलूटी के विभिन्न हिस्सों में मां काली के आठ मंदिर हैं। इसके अलावा मलूटी पंचायत के प्रतापपुर गांव में भी विधि-विधान से पूजा होती है। प्रकाशित विवरण के अनुसार, श्मशान काली मंदिर में पूजा के दौरान तारापीठ सहित अलग-अलग क्षेत्रों से साधक पहुंचते हैं। गांव के अलग-अलग पूजा स्थलों पर वर्षों से चली आ रही स्थानीय धार्मिक परंपराएं निभाई जाती हैं।

पूजा की तैयारियों में गांव के परिवार भी अपनी-अपनी भूमिका निभा रहे हैं। मां काली के भोग के लिए सात प्रकार के साग जुटाए जा रहे हैं। पूजा से जुड़ी निशाकालीन रस्मों के बाद प्रसाद अगले दिन ग्रहण करने और प्रतिमा विसर्जन से पहले सुबह भोग अर्पित करने की परंपरा भी यहां प्रचलित है।

मलूटी की काली पूजा की एक अलग पहचान स्थानीय खानपान से बनती है। पूजा की रात गांव के घरों में चावल नहीं पकाया जाता। इसके स्थान पर लुची-माछेर झोल, चने की दाल और कोहड़े की सब्जी परोसी जाती है। घरों में नारियल के लड्डू तथा छेना और बेसन की मिठाइयां भी तैयार की जाती हैं।

इस अवसर पर मलूटी से बाहर रहने वाले अनेक परिवार गांव लौटते हैं। स्थानीय अनुमान के अनुसार, पूजा के समय बाहर बसे लगभग ढाई से तीन हजार लोगों का जुटान होता है। सात दिवसीय मेले में झारखंड के आसपास के गांवों के साथ पश्चिम बंगाल के सीमावर्ती इलाकों से भी बड़ी संख्या में लोग पहुंचते हैं।

मां मौलीक्षा मंदिर परिसर में तीन दिन और बांदार काली परिसर में सात दिन मेला लगता है। मेले में जलेबी की मांग विशेष रूप से अधिक रहती है और सात दिनों में इसकी खपत करीब 25 से 30 क्विंटल बताई गई है। इसके अलावा मनीहारी सामान, आइसक्रीम और झूले भी मेले के प्रमुख आकर्षण रहते हैं।