देवघर के सरकारी पशु अस्पतालों में दवाओं की कमी, बाजार से खरीदने को मजबूर पशुपालक

जिले में करीब एक वर्ष से पशुओं की जरूरी दवाओं की खरीद नहीं होने से सरकारी अस्पतालों में इलाज प्रभावित है। विभाग ने समस्या स्वीकार करते हुए राज्य स्तर पर संपर्क की बात कही है।

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देवघर के पशु चिकित्सालय में इलाज के लिए पहुंचे पशुपालक

देवघर जिले के सरकारी पशु अस्पतालों में जरूरी दवाओं की कमी के कारण पशुपालकों को इलाज के लिए निजी दुकानों पर निर्भर होना पड़ रहा है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, पशुपालन विभाग में करीब एक वर्ष से पशुओं की दवाओं की खरीद नहीं हुई है। इसका असर प्रखंड और ग्रामीण क्षेत्रों के अस्पतालों के साथ जिला पशु चिकित्सालय पर भी दिखाई दे रहा है।

इलाज के लिए पहुंच रहे पशुपालकों का कहना है कि कई स्थानीय अस्पतालों में सामान्य बीमारियों की दवाएं भी उपलब्ध नहीं रहतीं। कृमि की समस्या जैसी सामान्य स्थिति में भी बाहर से दवा खरीदनी पड़ती है। जिला अस्पताल आने के बाद भी जरूरत की कुछ दवाएं और इंजेक्शन बाजार से लेने की मजबूरी बनी हुई है।

पशु अस्पताल के चिकित्सक डॉ. अनिल तिवारी के मुताबिक, प्रखंड और ग्रामीण इलाकों में दवाओं की कमी के कारण ऐसे पशुओं को भी जिला अस्पताल लाया जा रहा है, जिनका इलाज स्थानीय स्तर पर किया जा सकता था। जिले के विभिन्न क्षेत्रों से प्रतिदिन 100 से अधिक पशुपालक बीमार पशुओं को लेकर जिला पशु चिकित्सालय पहुंच रहे हैं। इससे अस्पताल पर अतिरिक्त दबाव बढ़ रहा है।

पशुपालकों के अनुसार, कैल्शियम स्प्रे से लेकर जरूरी और महंगे इंजेक्शन तक निजी दुकानों से खरीदने पड़ रहे हैं। इससे विशेष रूप से आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों पर अतिरिक्त खर्च पड़ रहा है। कुछ पशुपालकों ने दावा किया कि महंगी दवाएं नहीं खरीद पाने के कारण उनके पशुओं की मौत भी हुई, हालांकि उपलब्ध विवरण में इन दावों की अलग से पुष्टि नहीं दी गई है।

जिला पशुपालन पदाधिकारी धनंजय कुमार ने दवाओं की कमी और उससे हो रही परेशानी को स्वीकार किया है। उनके अनुसार, आवश्यक दवाएं उपलब्ध नहीं रहने पर कई बार पशुपालकों को अस्पताल से वापस लौटना पड़ता है। समस्या के समाधान और महत्वपूर्ण दवाओं की उपलब्धता सुनिश्चित कराने के लिए राज्य स्तर के अधिकारियों से संपर्क किया जा रहा है।

फिलहाल दवाओं की आपूर्ति शुरू होने की कोई निश्चित तारीख सामने नहीं आई है। ऐसे में ग्रामीण अस्पतालों में उपचार की उपलब्धता, जिला अस्पताल पर बढ़ता दबाव और पशुपालकों पर पड़ रहा अतिरिक्त आर्थिक बोझ मुख्य चिंता बने हुए हैं। विभागीय प्रयास का असर दवाओं की वास्तविक आपूर्ति शुरू होने के बाद ही स्पष्ट हो सकेगा।