रांची स्थित झारखंड हाई कोर्ट में देवघर कोषागार से निकासी से जुड़े चारा घोटाला मामले में लालू प्रसाद समेत अन्य की अपीलों पर बुधवार को सुनवाई हुई। इस दौरान अपीलकर्ता की ओर से देवघर के दो तत्कालीन उपायुक्तों सुखदेव सिंह और आरके खंडेलवाल की गवाही अदालत के सामने रखी गई। सुनवाई में संबंधित अवधि की निकासी, प्रशासनिक पत्राचार और जांच प्रक्रिया से जुड़े बिंदुओं पर चर्चा हुई।
अदालत में पेश विवरण के अनुसार, सुखदेव सिंह वर्ष 1993-94 में देवघर के उपायुक्त थे। उन्होंने गवाही में बताया था कि जुलाई 1993 में पशुपालन विभाग के अधिकारियों द्वारा कोषागार से गलत तरीके से बिल पारित कराए जाने की शिकायत मिली थी। इसके बाद उन्होंने कोषागार पदाधिकारी से चर्चा की और जिला पशुपालन पदाधिकारी से आवंटन पत्र मांगे थे।
गवाही के मुताबिक, आवंटन से संबंधित पत्र उपलब्ध नहीं होने पर कई स्मारक पत्र भेजे गए। सुखदेव सिंह ने 16 मई 1994 को तत्कालीन दुमका आयुक्त को पत्र लिखकर दस्तावेज उपलब्ध कराने और जरूरत पड़ने पर मजिस्ट्रेट नियुक्त करने का अनुरोध किया था। इसके कुछ दिनों बाद उनका स्थानांतरण हो गया था।
अपीलकर्ता के अधिवक्ता ने दलील दी कि गवाही में जिन पत्रों का उल्लेख किया गया, उन्हें प्रदर्शित नहीं किया गया था। जिरह के दौरान सुखदेव सिंह ने कहा था कि शिकायत मिलने से पहले उन्होंने अतिरिक्त निकासी को लेकर जांच नहीं की थी। उन्होंने यह भी बताया कि मजिस्ट्रेट की जांच रिपोर्ट पर आगे क्या कार्रवाई हुई, इसकी जानकारी उन्हें नहीं थी।
दूसरे गवाह आरके खंडेलवाल पांच नवंबर 1995 से 11 जून 1996 तक देवघर के उपायुक्त रहे थे। उनकी गवाही के अनुसार, फरवरी 1996 में वित्त विभाग का फैक्स मिलने के बाद एक जांच समिति बनाई गई थी। समिति को वित्तीय वर्ष 1980-81 से 1995-96 तक की निकासी की जांच का जिम्मा दिया गया था।
जिरह में खंडेलवाल ने कहा था कि उपायुक्त जिला कोषागार का प्रमुख होता है, जबकि रोजमर्रा का काम कोषागार पदाधिकारी देखते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि उन्हें याद नहीं है कि उनके कार्यकाल में अतिरिक्त निकासी हुई थी या नहीं। उनके अनुसार जांच रिपोर्ट में चार वर्षों के आवंटन का ब्योरा था और बिलों की जांच का अंतिम सक्षम प्राधिकारी महालेखाकार था। मामले में अन्य आरोपितों की ओर से हुई जिरह के अंश भी अदालत के समक्ष रखे गए।