देवघर में पांच साल बाद रेशम उत्पादन दोबारा शुरू करने की तैयारी, 60 कारीगरों को मिलेगा काम

झारक्राफ्ट की शिल्पग्राम इकाई में दुर्गा पूजा के बाद पायलट परियोजना शुरू करने की तैयारी है। इसके तहत कोकून से धागा और रेशमी उत्पाद बनाए जाएंगे तथा 60 प्रशिक्षित कारीगरों को काम से जोड़ा जाएगा।

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देवघर की झारक्राफ्ट सिल्क इकाई में लगी रेशम उत्पादन मशीनें

देवघर में करीब पांच साल से बंद पड़ी रेशम उत्पादन गतिविधियों को फिर शुरू करने की तैयारी की जा रही है। प्रस्तावित पायलट परियोजना के तहत झारक्राफ्ट की शिल्पग्राम इकाई में कोकून से धागा निकालने और रेशमी धागे से कपड़े व साड़ी तैयार करने का काम दुर्गा पूजा के बाद शुरू होने की संभावना है। इससे पहले से प्रशिक्षित 60 कारीगरों को रोजगार मिलने की बात कही गई है।

देवघर जिले में झारक्राफ्ट की इकाई वर्ष 2016 में शुरू हुई थी। इसका उद्देश्य बुनकरों और कारीगरों को प्रशिक्षण देकर उत्पादन से जोड़ना तथा तैयार सामान को बाजार उपलब्ध कराना था। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, वर्ष 2016 से 2019 के बीच कोकून से धागा बनाने के लिए 120 लोगों को प्रशिक्षित किया गया था।

इसके बाद नियमित काम उपलब्ध नहीं होने से कई प्रशिक्षित कारीगरों को अपनी क्षमता के अनुसार दूसरे अवसर तलाशने पड़े। वर्ष 2020 से इकाई में कोकून से धागा बनाने से संबंधित नया प्रशिक्षण और रोजगार बंद रहा। अब उन्हीं प्रशिक्षित लोगों में से 60 को उत्पादन प्रक्रिया से जोड़ने की तैयारी है। धागा तैयार करने वाले कारीगरों को मानदेय के आधार पर भुगतान किए जाने की योजना बताई गई है।

शिल्पग्राम परिसर में प्रशिक्षण, उत्पादन और उत्पादों के प्रदर्शन के लिए आधारभूत सुविधाएं मौजूद हैं। वहां विपणन परिसर भी बना हुआ है। कोकून से धागा निकालने के लिए लगाई गई करीब 200 मशीनों में लगभग 55 को छोड़कर शेष मशीनों को मरम्मत की जरूरत बताई गई है। परियोजना शुरू करने से पहले इन संसाधनों को उपयोग योग्य बनाना अहम होगा।

देवघर के मधुपुर स्थित जीतपुर जंगल में अर्जुन और आसन के करीब तीन लाख पौधे होने की जानकारी दी गई है। इस क्षेत्र में आदिवासी और घटवाल समुदाय के किसान लंबे समय से कोकून उत्पादन से जुड़े हैं। स्थानीय स्तर पर प्रसंस्करण की पर्याप्त व्यवस्था नहीं होने के कारण उत्पादकों को कोकून बाहर के व्यापारियों को बेचना पड़ता है।

प्रस्तावित इकाई चालू होने पर कोकून की खरीद, धागा निर्माण और उससे तैयार उत्पाद बनाने की प्रक्रिया स्थानीय स्तर पर विकसित हो सकती है। फिलहाल झारक्राफ्ट के माध्यम से परियोजना शुरू करने की प्रक्रिया जारी है। उत्पादन आरंभ होने पर ही इसकी वास्तविक क्षमता, कारीगरों को मिलने वाले काम और स्थानीय रेशम कारोबार पर असर की स्पष्ट तस्वीर सामने आएगी।