धनबाद के पुटकी स्थित श्रीनगर में दुर्गा पूजा का आयोजन 33 वर्षों से महिलाओं की भागीदारी और नेतृत्व की पहचान बना हुआ है। वर्ष 1993 में रेणुका घोष और परिवार की अन्य महिलाओं ने जिस पूजा की शुरुआत की थी, उसकी जिम्मेदारी अब अगली पीढ़ी की महिलाएं संभाल रही हैं। रेणुका घोष के निधन के बाद उनकी बहू कुमकुम घोष आयोजन को आगे बढ़ा रही हैं।
मोहल्ले में पूजा शुरू करने के पीछे स्थानीय महिलाओं की सुविधा से जुड़ी जरूरत थी। पहले उन्हें पूजा और पुष्पांजलि के लिए पुटकी बाजार स्थित मंदिर जाना पड़ता था। वहां अधिक भीड़ होने के कारण कई बार वे ठीक से पूजा नहीं कर पाती थीं। इसके बाद महिलाओं ने श्रीनगर में ही सामूहिक दुर्गा पूजा आयोजित करने का निर्णय लिया और इसके संचालन के लिए महिला समिति बनाई।
समिति की महिलाएं चंदा जुटाने से लेकर पूजा की तैयारियों और विसर्जन तक की जिम्मेदारी निभाती हैं। श्रीनगर, पुटकी बाजार और आसपास के इलाकों से सहयोग जुटाने का काम करीब एक से डेढ़ महीने तक चलता है। आयोजन का बजट लगभग दो लाख रुपये बताया गया है, जिसमें स्थानीय लोगों का भी सहयोग मिलता है।
आयोजन से जुड़ी महिलाएं घर, बच्चों, नौकरी और दूसरे कामों के बीच पूजा के लिए समय निकालती हैं। वे सुबह घरेलू जिम्मेदारियां पूरी करने के बाद चंदा संग्रह और अन्य तैयारियों में जुटती हैं। इस व्यवस्था में बुजुर्ग महिलाओं की शुरू की गई परंपरा को बहुएं सामूहिक जिम्मेदारी के रूप में आगे बढ़ा रही हैं।
पूजा के दौरान धार्मिक अनुष्ठानों के साथ डांडिया, नृत्य और नाटक जैसे सांस्कृतिक कार्यक्रम भी आयोजित किए जाते हैं। अष्टमी के दिन यहां श्रद्धालुओं की विशेष भीड़ रहती है। विसर्जन में भी महिलाएं मिलकर शामिल होती हैं और प्रतिमा को घाट तक ले जाने की प्रक्रिया में सक्रिय भूमिका निभाती हैं।
इस पूजा में अलग-अलग परिवारों और समुदायों की महिलाएं एक साथ काम करती हैं। स्थानीय महिलाओं के अनुसार आयोजन में जातिगत भेदभाव नहीं रखा जाता और सभी समान रूप से भाग लेते हैं। इस तरह श्रीनगर की दुर्गा पूजा धार्मिक आयोजन के साथ पीढ़ियों के बीच जिम्मेदारी के हस्तांतरण, महिला सहभागिता और मोहल्ले की सामूहिकता का उदाहरण बनी हुई है।