धनबाद में शरद पूर्णिमा आज, अलग-अलग समुदायों में लक्खी पूजा, कोजागरा और शरद पूनम की तैयारी

शरद पूर्णिमा पर धनबाद में बंगाली, मिथिला, गुजराती और वैष्णव समुदाय अपनी-अपनी परंपराओं के अनुसार पूजा और सांस्कृतिक आयोजन करेंगे।

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झारखंड24 का पूर्ण लोगो—प्रकाशक की लोगो-मात्र छवि के स्थान पर

धनबाद में रविवार को शरद पूर्णिमा अलग-अलग धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं के साथ मनाई जाएगी। अश्विन मास की पूर्णिमा के अवसर पर बंगाली समुदाय लक्खी पूजा करेगा, जबकि मिथिला के लोग कोजागरा और गुजराती समाज शरद पूनम मनाएगा। वैष्णव परंपरा में इस तिथि को रास पूर्णिमा कहा जाता है।

शरद पूर्णिमा की रात खुले आसमान के नीचे खीर रखने की परंपरा भी निभाई जाएगी। धार्मिक मान्यता है कि इस रात चंद्रमा अपनी 16 कलाओं के साथ दिखाई देता है और चांदनी में रखी खीर विशेष मानी जाती है। समुद्र मंथन से देवी लक्ष्मी के प्रकट होने की मान्यता भी इस पर्व से जुड़ी है।

बंगाली समुदाय के पूजा मंडपों में मां लक्ष्मी की प्रतिमा स्थापित कर अनुष्ठान किया जाएगा। हरि मंदिर, हीरापुर दुर्गा मंडप, कोयला नगर दुर्गा मंडप और जगधात्री क्लब सहित विभिन्न स्थानों पर महिलाएं पूजा में शामिल होंगी। इन जगहों पर पहले दुर्गा प्रतिमाएं स्थापित की गई थीं।

मिथिला की कोजागरा परंपरा में मखाना, पान और मधुर का विशेष महत्व है। नवविवाहिता के घर से वर पक्ष के लिए पान, मखाना, केला, दही, मिठाई और नए कपड़ों समेत अलग-अलग सामग्री भेजने की परंपरा है। नवविवाहित जोड़े की सुख-शांति के लिए पूजा की जाती है और महिलाएं दिनभर निर्जला उपवास के बाद शाम में लक्ष्मी पूजन करती हैं।

गुजराती समाज शरद पूनम के अवसर पर रात में खुले मैदान या छत पर जुटेगा। गर्म दूध में चीनी और चूड़ा डालकर उसे चांदनी में रखने के साथ कृष्ण भजनों पर रास-गरबा किया जाएगा। धनबाद के इस्कॉन में भी दीपदान का विशेष अनुष्ठान आयोजित करने की तैयारी है।

ब्रज और वैष्णव परंपरा में यह पर्व रास पूर्णिमा के रूप में मनाया जाता है। इससे भगवान कृष्ण और गोपियों के रास की धार्मिक मान्यता जुड़ी है। इस तरह धनबाद में एक ही पूर्णिमा तिथि पर पूजा, उपवास, दीपदान और सांस्कृतिक कार्यक्रमों के विविध रूप देखने को मिलेंगे।