पटमदा सामूहिक दुष्कर्म मामले में चार दोषियों की 20 साल की सजा हाईकोर्ट ने रखी बरकरार

झारखंड हाईकोर्ट ने 2013 के पटमदा सामूहिक दुष्कर्म मामले में चार दोषियों की अपील खारिज कर निचली अदालत से मिली 20-20 साल की सजा और जुर्माना बरकरार रखा।

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झारखंड हाईकोर्ट ने पटमदा मामले में चार दोषियों की सजा बरकरार रखी

झारखंड हाईकोर्ट ने पूर्वी सिंहभूम जिले के पटमदा थाना क्षेत्र में 2013 में हुए सामूहिक दुष्कर्म के मामले में चार दोषियों की अपील खारिज कर दी है। न्यायमूर्ति आनंद सेन और न्यायमूर्ति पीके श्रीवास्तव की खंडपीठ ने निचली अदालत से मिली 20-20 साल के कठोर कारावास तथा जुर्माने की सजा को सही ठहराया।

खंडपीठ ने फैसले में कहा कि चिकित्सीय जांच में शुक्राणु नहीं मिलने या मेडिकल रिपोर्ट में तकनीकी कमियां होने भर से पीड़िता की विश्वसनीय गवाही को अस्वीकार नहीं किया जा सकता। अदालत ने पीड़िता के बयान को भरोसेमंद माना और उसके शरीर पर दर्ज चोट तथा खरोंच के निशानों को भी मामले के साक्ष्यों के रूप में देखा।

अदालत ने प्राथमिकी दर्ज कराने में तीन दिन की देरी से जुड़ी दलील पर भी विचार किया। फैसले के अनुसार, ग्रामीण परिवेश में पीड़िता के परिजनों ने पहले पंचायत के माध्यम से समाधान का प्रयास किया था। आरोपियों के वहां उपस्थित नहीं होने के बाद 8 नवंबर 2013 को पटमदा थाने में प्राथमिकी दर्ज कराई गई। खंडपीठ ने इन परिस्थितियों में हुई देरी को स्वाभाविक माना।

अभियोजन के अनुसार, घटना 5 नवंबर 2013 को उस समय हुई थी जब महिला अपनी ससुराल से मायके जा रही थी। लपित छेंचा जंगल के पास चार लोगों ने उसे रोका और अपराध को अंजाम दिया। इसके बाद महिला ने परिजनों को घटना की जानकारी दी थी।

जमशेदपुर की त्वरित अदालत ने 23 अगस्त 2018 को हेमंत सिंह, रामनाथ सिंह, विभीषण सिंह और फागु हांसदा को दोषी ठहराया था। 29 अगस्त 2018 को प्रत्येक को 20 साल के कठोर कारावास और 40 हजार रुपये जुर्माने की सजा सुनाई गई। चारों ने इस निर्णय को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।

हाईकोर्ट ने हेमंत सिंह को जेल में ही रहने का निर्देश दिया है। रामनाथ सिंह, विभीषण सिंह और फागु हांसदा को दो महीने के भीतर अदालत में आत्मसमर्पण करने का आदेश मिला है। निर्धारित अवधि में आत्मसमर्पण नहीं करने पर उनके विरुद्ध नियमानुसार कार्रवाई की जाएगी।