पति के विवाहेतर संबंध को स्वीकार करने का दबाव मानसिक क्रूरता, झारखंड हाईकोर्ट ने दी तलाक की मंजूरी

धनबाद के दो चिकित्सकों के वैवाहिक विवाद में झारखंड हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट का आदेश रद्द करते हुए पत्नी की अपील स्वीकार की और विवाह विच्छेद की डिक्री पारित कर दी।

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झारखंड हाईकोर्ट के फैसले से संबंधित सांकेतिक दृश्य

झारखंड हाईकोर्ट ने धनबाद के एक वैवाहिक विवाद में पत्नी की अपील स्वीकार करते हुए तलाक की मंजूरी दे दी है। अदालत ने पत्नी पर पति के कथित विवाहेतर संबंध को स्वीकार करने और दूसरी महिला के साथ रहने का दबाव डालने को गंभीर मानसिक क्रूरता माना। खंडपीठ ने मामले में फैमिली कोर्ट का आदेश रद्द करते हुए विवाह विच्छेद की डिक्री पारित की।

मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति सुजीत नारायण प्रसाद और न्यायमूर्ति प्रदीप कुमार श्रीवास्तव की खंडपीठ ने की। उपलब्ध विवरण के अनुसार, पति और पत्नी दोनों चिकित्सा क्षेत्र से जुड़े हैं और उनका विवाह 24 फरवरी 2018 को हिंदू रीति-रिवाज से हुआ था। पत्नी भारत कोकिंग कोल लिमिटेड में कार्यरत थीं, जबकि पति टुंडी के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में तैनात थे।

पत्नी ने आरोप लगाया था कि पति का एक विधवा महिला के साथ विवाहेतर संबंध था। उनका कहना था कि पति उनसे उस महिला को स्वीकार करने और छोटी बहन की तरह साथ रखने की अपेक्षा करते थे। पत्नी ने विरोध करने पर शारीरिक प्रताड़ना का भी आरोप लगाया और अपने दावों के समर्थन में चिकित्सा दस्तावेज तथा मौखिक साक्ष्य प्रस्तुत किए।

पति ने इन आरोपों से इनकार किया था। उन्होंने पत्नी की ओर से दिए गए उन चिकित्सा दस्तावेजों की विश्वसनीयता पर भी सवाल उठाया, जो पत्नी के पिता के स्वामित्व वाले क्लिनिक से जारी हुए थे। हाईकोर्ट ने कहा कि केवल दस्तावेजों के स्रोत के आधार पर उन्हें खारिज नहीं किया जा सकता और उपलब्ध रिकॉर्ड तथा गवाहों के बयानों का समग्र मूल्यांकन जरूरी है।

पत्नी ने हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 13(1)(ia) के तहत मानसिक और शारीरिक क्रूरता के आधार पर तलाक मांगा था। खंडपीठ के अनुसार, फैमिली कोर्ट ने साक्ष्यों को अलग-अलग देखा और मामले की पूरी परिस्थितियों का पर्याप्त आकलन नहीं किया। हाईकोर्ट ने वैवाहिक क्रूरता के परीक्षण से जुड़े सुप्रीम कोर्ट के समर घोष बनाम जया घोष फैसले का भी संदर्भ लिया।

अदालत ने उपलब्ध परिस्थितियों को एक साथ देखते हुए माना कि कथित विवाहेतर संबंध स्वीकार करने का दबाव, दूसरी महिला के साथ रहने की अपेक्षा और प्रताड़ना से जुड़े साक्ष्य मानसिक क्रूरता के निष्कर्ष का आधार बनते हैं। फैसले में वैवाहिक संबंधों के भीतर आपसी विश्वास, सम्मान और मानसिक सुरक्षा की अहमियत रेखांकित की गई है।