पाकुड़ रेलवे स्टेशन परिसर में करीब 105 वर्षों से चली आ रही दुर्गा पूजा की परंपरा इस वर्ष भी जारी है। आयोजन समिति पंडाल को अंतिम रूप देने के साथ पूजा से जुड़ी अन्य तैयारियां पूरी करने में जुटी है। वर्षों के दौरान इसका स्वरूप विस्तृत हुआ और अब इसे पाकुड़ शहर के प्रमुख दुर्गा पूजा आयोजनों में गिना जाता है।
सामाजिक कार्यकर्ता एवं भाजपा नेता हिसाबी राय के मुताबिक, रेलवे परिचालन शुरू होने के बाद यहां कार्यरत बंगाली समुदाय के कर्मचारियों ने छोटे स्तर पर पूजा आरंभ की थी। बाद में स्थानीय पत्थर व्यवसायियों और शहर के लोगों का सहयोग भी मिलने लगा। सामुदायिक भागीदारी बढ़ने के साथ स्टेशन परिसर का आयोजन बड़ा होता गया।
आयोजन समिति के सचिव संतोष ठाकुर ने बताया कि पूजा पर करीब सात लाख रुपये खर्च किए जाते हैं। इसमें पाकुड़ शहर के निवासियों के अलावा आसपास के गांवों और बाहर से आने वाले श्रद्धालु भी भाग लेते हैं। पूजा के दिनों में स्टेशन परिसर में बड़ी संख्या में लोगों की आवाजाही रहती है।
समिति के अनुसार, सिंदूर खेला आयोजन का प्रमुख आकर्षण रहता है और इसमें महिलाओं की व्यापक भागीदारी होती है। पूजा के दौरान सांस्कृतिक कार्यक्रम भी आयोजित किए जाते हैं। आयोजकों का कहना है कि धार्मिक अनुष्ठानों के साथ स्थानीय सहभागिता इस पुरानी परंपरा की खास पहचान बनी हुई है।
स्थानीय लोगों के अनुसार, पुरोहित सजल चटर्जी और सुकांतो साहना करीब 15 वर्षों से स्टेशन परिसर में दुर्गा पूजा संपन्न करा रहे हैं। वे यहां काली पूजा और गणेश पूजा भी कराते हैं। अनुष्ठानों में स्थानीय पुरोहितों का सहयोग भी लिया जाता है।
पाकुड़ के अलावा हिरणपुर, गोपीनाथपुर, डांगापाड़ा, हीरानंदनपुर और मालपहाड़ी सहित आसपास के क्षेत्रों से श्रद्धालु इस पूजा में पहुंचते हैं। स्थानीय सहयोग से संचालित यह आयोजन अपने पुराने स्वरूप और सामुदायिक जुड़ाव को बनाए रखते हुए इस वर्ष एक बार फिर श्रद्धालुओं के स्वागत की तैयारी कर रहा है।