बोकारो के पिंड्राजोरा में पारंपरिक सिक्की कला को संरक्षित करने और इससे आजीविका के अवसर विकसित करने के उद्देश्य से सप्ताहभर का क्षमता निर्माण कार्यक्रम शुरू किया गया है। प्रशिक्षण का विषय ‘सतत आजीविका और सांस्कृतिक संरक्षण के लिए सिक्की कला’ रखा गया है। इसमें महिला स्वयं सहायता समूहों की सदस्याओं और गृहिणियों सहित 30 प्रतिभागियों ने पंजीकरण कराया है।
कार्यक्रम का आयोजन आईआईटी आईएसएम धनबाद के पर्यावरण विज्ञान एवं इंजीनियरिंग विभाग में संचालित ईआईएसीपी कार्यक्रम केंद्र ने झारखंड फाउंडेशन केंद्र के सहयोग से किया है। भारत सरकार के पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के तत्वावधान में आयोजित यह प्रशिक्षण 4 सितंबर तक चलेगा। इसे व्यावहारिक स्वरूप दिया गया है, ताकि प्रतिभागी उत्पाद बनाने की तकनीक सीख सकें।
सिक्की कला में स्थानीय स्तर पर उपलब्ध सिक्की घास से टोकरियां, डिब्बे, कंटेनर, आभूषण और सजावटी वस्तुएं तैयार की जाती हैं। प्राकृतिक सामग्री के उपयोग के कारण यह हस्तशिल्प पर्यावरण के अनुकूल आजीविका का विकल्प माना जाता है। प्रशिक्षण में विशेषज्ञ नाजदा खातून और मो. जसीम प्रतिभागियों को कला की बारीकियों तथा अलग-अलग उत्पाद बनाने की जानकारी दे रहे हैं।
ईआईएसीपी केंद्र के समन्वयक प्रो. आलोक सिन्हा ने उद्घाटन के दौरान पारंपरिक कौशल को सांस्कृतिक विरासत और स्थायी आय से जोड़ने की बात कही। उन्होंने बताया कि प्रशिक्षण पूरा करने वाले इच्छुक प्रतिभागियों को आईआईटी आईएसएम धनबाद के विभिन्न संस्थागत कार्यक्रमों में स्टॉल उपलब्ध कराने का प्रयास किया जाएगा। इससे उन्हें अपने उत्पाद प्रदर्शित करने और बेचने का अवसर मिल सकेगा।
कार्यक्रम को मिशन लाइफ की अवधारणा से भी जोड़ा गया है। उद्घाटन सत्र में केंद्र की सूचना अधिकारी डॉ. अवंतिका चंद्रा ने प्रतिभागियों को मिशन लाइफ की शपथ दिलाई। प्रो. सुनील कुमार गुप्ता और झारखंड फाउंडेशन केंद्र के कार्यकारी निदेशक डॉ. जयदेव महतो ने पारंपरिक आजीविका, पर्यावरण संरक्षण और स्थानीय रोजगार के बीच संबंध पर अपने विचार रखे।
ईआईएसीपी केंद्र के सह-समन्वयक प्रो. सुरेश पांडियन के अनुसार, प्रशिक्षण के समापन पर प्रतिभागियों के कौशल, रचनात्मकता और सक्रिय सहभागिता का मूल्यांकन होगा। मूल्यांकन के आधार पर बेहतर प्रदर्शन करने वाले तीन प्रशिक्षुओं को सम्मानित किया जाएगा। कार्यक्रम का लक्ष्य प्रशिक्षण तक सीमित न रहकर तैयार उत्पादों को बाजार से जोड़ने की दिशा में प्रतिभागियों का कौशल बढ़ाना भी है।