पुल ढहने के पुराने मामलों की जांच तीन महीने में पूरी करने का हाईकोर्ट का निर्देश

झारखंड हाईकोर्ट ने धनबाद, पलामू और गुमला में पुल ढहने से जुड़ी लंबित एफआईआर की जांच तथा विभागीय कार्यवाही को समयबद्ध तरीके से पूरा करने का निर्देश दिया है।

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रांची स्थित झारखंड हाईकोर्ट का भवन

झारखंड हाईकोर्ट ने धनबाद, पलामू और गुमला में पुल ढहने से जुड़े पुराने आपराधिक मामलों की जांच में देरी पर चिंता जताई है। मुख्य न्यायाधीश एमएस सोनक और न्यायमूर्ति मनोज प्रसाद की खंडपीठ ने संबंधित जिलों के पुलिस अधीक्षकों को जांच पूरी कर अधिमानतः तीन महीने के भीतर सक्षम अदालतों में अंतिम रिपोर्ट दाखिल कराने की दिशा में कार्रवाई सुनिश्चित करने का निर्देश दिया है।

यह आदेश पंकज कुमार यादव की जनहित याचिका पर 14 अक्टूबर को सुनाया गया। याचिका में अलग-अलग जिलों में पुल गिरने, निर्माण में कथित अनियमितताओं और जिम्मेदार अधिकारियों के विरुद्ध कार्रवाई नहीं होने का मुद्दा उठाया गया था। अदालत के सामने आए रिकॉर्ड के अनुसार, तीनों जिलों के संबंधित मामले 2009 से 2015 के बीच दर्ज किए गए थे, लेकिन उनकी जांच अब तक लंबित थी।

खंडपीठ ने कहा कि आपराधिक जांच को एक दशक से अधिक समय तक लंबित रखना न्याय व्यवस्था और संबंधित पक्षों के अधिकारों के अनुकूल नहीं है। अदालत ने धनबाद, पलामू और गुमला के एसपी को संबंधित एफआईआर की जांच तेज करने तथा दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 173 के तहत अंतिम रिपोर्ट दाखिल कराने के लिए कदम उठाने को कहा।

हाईकोर्ट ने ग्रामीण विकास विभाग के सचिव को भी इन प्रकरणों से जुड़ी लंबित विभागीय कार्यवाही की प्रगति की निगरानी करने का निर्देश दिया। विभागीय प्रक्रिया को कानून के अनुरूप अधिमानतः तीन महीने में तार्किक निष्कर्ष तक पहुंचाने को कहा गया है। तय अवधि के बाद संबंधित एसपी और विभागीय सचिव को अनुपालन हलफनामा देना होगा। समयसीमा पूरी न होने पर देरी के कारण भी स्पष्ट करने होंगे।

याचिका में मामलों की व्यापक जांच, वरिष्ठ अधिकारियों के विरुद्ध कार्रवाई और प्रवर्तन निदेशालय से जांच कराने की मांग भी की गई थी। अदालत ने उपलब्ध रिकॉर्ड के आधार पर नई व्यापक जांच या केंद्रीय एजेंसी को मामला सौंपने का निर्देश नहीं दिया। बीरेंद्र राम और अन्य आरोपितों से जुड़े मामले में अभियोजन शिकायत दाखिल होने तथा विशेष अदालत द्वारा संज्ञान लिए जाने का उल्लेख करते हुए अलग निर्देश की आवश्यकता नहीं मानी गई।

राज्य सरकार ने अदालत को बताया था कि संबंधित मामलों में एफआईआर दर्ज की गई, ठेकेदारों के विरुद्ध कदम उठाए गए और अधिकारियों पर विभागीय कार्यवाही शुरू हुई। कुछ पुलों की तकनीकी जांच बिरसा इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी, मेसरा से भी कराई गई। हाईकोर्ट ने नई जांच का आदेश देने के बजाय पहले से लंबित आपराधिक और विभागीय प्रक्रियाओं को समयबद्ध ढंग से पूरा करने पर जोर दिया।