पूर्वी सिंहभूम की यूरेनियम खदानें और तुरामडीह स्थित प्रसंस्करण मिल देश के परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम से जुड़ी अहम इकाइयों में शामिल हैं। जिले में यूरेनियम की सात खदानें बताई गई हैं। इनमें बदुहुरंग में एशिया की एकमात्र ओपन कास्ट यूरेनियम खदान संचालित होने का दावा किया गया है। खदान से निकले अयस्क को कई भौतिक और रासायनिक चरणों से गुजारने के बाद प्रारंभिक यूरेनियम उत्पाद तैयार होता है।
यूरेनियम वाले अयस्क और अनुपयोगी चट्टान को केवल देखकर अलग करना आसान नहीं होता। इसके लिए भौतिकी, भूविज्ञान और एएमडी से मिले आंकड़ों की सहायता ली जाती है। भूगर्भीय जानकारी के आधार पर ड्रिलिंग और ब्लास्टिंग की जगह तय की जाती है। खोजपूर्ण छिद्रों की लॉगिंग के बाद सामग्री में यूरेनियम का अंश मिलने पर उसे प्रसंस्करण के लिए मिल भेजा जाता है, जबकि अनुपयोगी सामग्री अलग कर दी जाती है।
रिपोर्ट के अनुसार, यूरेनियम कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड की खदानों से तुरामडीह क्षेत्र की मिल को प्रतिदिन करीब तीन हजार टन अयस्क मिलता है। यहां तीन पिसाई सर्किट हैं और प्रत्येक में रॉड मिल तथा बॉल मिल लगी है। धूल को नियंत्रित रखने और सामग्री को आगे बढ़ाने के लिए पानी मिलाकर गीली पिसाई की जाती है।
पिसाई के बाद बने घोल से थिकनिंग प्रक्रिया के माध्यम से अतिरिक्त पानी अलग किया जाता है। महीन कणों को एक साथ बैठाने के लिए फ्लोक्वेंट मिलाया जाता है। अलग हुआ साफ पानी दोबारा मिल के काम में लिया जाता है। इसके बाद अयस्क में सल्फ्यूरिक एसिड और मैग्नीशियम मिलाकर लगभग 12 घंटे गर्म करने की प्रक्रिया बताई गई है।
प्रसंस्कृत घोल को आयन एक्सचेंज चरण से गुजारा जाता है, जिसमें यूरेनियम को चुनिंदा रूप से अलग किया जाता है। आगे चूने का पानी मिलाकर अवांछित आयरन को नीचे बैठाया जाता है। फिल्ट्रेशन, लीचिंग, एसिडिक फिल्ट्रेशन और प्रेसिपिटेशन जैसे प्रमुख चरण एक नियंत्रण कक्ष से डिजिटल और स्वचालित प्रणाली के जरिये संचालित किए जाते हैं।
इन सभी चरणों के बाद यूरेनियम का प्रारंभिक उत्पाद मिलता है, जिसे उद्योग में ‘येलो केक’ कहा जाता है। इसका आगे देश के परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम में उपयोग किया जाता है। खनन से लेकर अंतिम प्रारंभिक उत्पाद तक की यह प्रक्रिया अयस्क की पहचान, पानी के पुनः उपयोग, रासायनिक पृथक्करण और नियंत्रित स्वचालन पर आधारित है।