बीआईटी मेसरा में सफाईकर्मी रहीं मां की बेटी आरती महतो ने इंजीनियरिंग में हासिल की पीएचडी

रांची के तुरुप गांव की आरती महतो ने बीआईटी मेसरा से इंजीनियरिंग में पीएचडी पूरी की है। उनकी मां रानू देवी ने इसी संस्थान में सफाईकर्मी के रूप में काम करते हुए तीन बच्चों की पढ़ाई जारी रखी।

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बीआईटी मेसरा से इंजीनियरिंग में पीएचडी हासिल करने वाली रांची की आरती महतो

रांची जिले के तुरुप गांव की आरती महतो ने बीआईटी मेसरा से इंजीनियरिंग में पीएचडी की उपाधि हासिल की है। उनकी मां रानू देवी ने इसी संस्थान में सफाईकर्मी के रूप में काम करते हुए परिवार संभाला और तीनों बच्चों की शिक्षा को प्राथमिकता दी। दीक्षांत समारोह में आरती को उपाधि प्रदान की गई।

रिपोर्ट के अनुसार, पति के निधन के बाद रानू देवी पर तीन बच्चों के पालन-पोषण की जिम्मेदारी आ गई थी। कमजोर आर्थिक स्थिति के बीच उन्होंने बीआईटी मेसरा परिसर में सफाई का काम शुरू किया। शुरुआती दौर में उन्हें एक सप्ताह के काम के लिए 400 रुपये मिलते थे। संस्थान में उनकी सेवा का यह सफर 26 वर्षों तक चला और अब उनका मासिक वेतन करीब 15 हजार रुपये है।

आरती परिवार की मझली संतान हैं। आर्थिक और पारिवारिक चुनौतियों के बावजूद उन्होंने पढ़ाई जारी रखी। उन्होंने आरटीसी संस्थान से बीटेक पूरा करने के बाद अपनी योग्यता के आधार पर बीआईटी मेसरा में प्रवेश लिया। यहां एमटेक करने के बाद उन्होंने इंजीनियरिंग में शोध शुरू किया।

उनका शोध वायरलेस नेटवर्क और इमेज कम्युनिकेशन से जुड़े तकनीकी विषयों पर केंद्रित रहा। उच्च शिक्षा के दौरान बीआईटी मेसरा और सरकारी स्तर से मिली छात्रवृत्ति ने उनकी पढ़ाई जारी रखने में सहायता की। लंबे शैक्षणिक और शोध कार्य के बाद उन्होंने डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त की।

आरती को तुरुप गांव की पहली ऐसी महिला बताया गया है, जिन्होंने इंजीनियरिंग के क्षेत्र में डॉक्टरेट की डिग्री हासिल की है। दीक्षांत समारोह में उपाधि मिलने का अवसर उनके परिवार के लिए विशेष रहा। यह उपलब्धि उनकी पढ़ाई के साथ-साथ मां के लंबे श्रम और बच्चों की शिक्षा के प्रति प्रतिबद्धता से भी जुड़ी है।

आरती फिलहाल जमशेदपुर के एक शिक्षण संस्थान में व्याख्याता के रूप में कार्यरत हैं और विद्यार्थियों को पढ़ा रही हैं। उनके पति भारतीय रेलवे में सहायक लोको पायलट हैं। तुरुप से उच्च तकनीकी शिक्षा तक पहुंची आरती की शैक्षणिक यात्रा सीमित संसाधनों के बीच निरंतर पढ़ाई और संस्थागत सहायता की भूमिका को सामने रखती है।