झारखंड हाईकोर्ट ने पत्नी को मानसिक बीमारी से ग्रस्त बताकर तलाक की मांग करने वाले पति की अपील खारिज कर दी है। जस्टिस सुजीत नारायण प्रसाद और जस्टिस प्रदीप कुमार श्रीवास्तव की खंडपीठ ने चतरा फैमिली कोर्ट के 7 सितंबर 2024 के फैसले को बरकरार रखा। अदालत के अनुसार, पति क्रूरता अथवा कानून के तहत तलाक का आधार बनने वाली मानसिक बीमारी का ठोस प्रमाण पेश नहीं कर सका।
चतरा के इस दंपती की शादी 31 जनवरी 2016 को हुई थी और उनका एक बेटा है। पति केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल में कार्यरत था तथा उसकी तैनाती राजस्थान के कोटा में थी। उसने हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 13(1)(ia) और 13(1)(iii) के अंतर्गत तलाक मांगा था। निचली अदालत से राहत नहीं मिलने पर उसने हाईकोर्ट में अपील की थी।
पति का आरोप था कि पत्नी का व्यवहार शादी के शुरुआती दिनों से असामान्य और आक्रामक था। उसने यह भी दावा किया कि विवाह से पहले पत्नी की मानसिक स्थिति से जुड़ी जानकारी छिपाई गई। पत्नी ने इन आरोपों से इनकार किया और पति पर पांच लाख रुपये दहेज मांगने तथा प्रताड़ित करने का आरोप लगाया। उपलब्ध विवरण के मुताबिक, वह 2021 से अपने मायके में रह रही है।
सुनवाई में हाईकोर्ट ने पाया कि पति या उसके गवाह पत्नी द्वारा शारीरिक हिंसा अथवा गाली-गलौज किए जाने की बात प्रमाणित नहीं कर पाए। अदालत ने यह भी ध्यान में रखा कि पति का परिवार विवाह से पहले से महिला को जानता था। इस कारण जानकारी छिपाने के दावे को भी पर्याप्त आधार नहीं मिला।
पति ने एक मनोवैज्ञानिक रिपोर्ट के आधार पर पत्नी को स्किजोफ्रेनिया से पीड़ित बताया था। हाईकोर्ट के परीक्षण में उस रिपोर्ट से बीमारी की पुष्टि या उसके लाइलाज होने की बात स्थापित नहीं हुई। इसके विपरीत, रांची के रिनपास मेडिकल बोर्ड ने दोनों पक्षों की मौजूदगी में जांच कर महिला में मानसिक बीमारी का कोई लक्षण नहीं पाया था। अदालत ने महिला के जवाबों, बच्चे की देखभाल और दोबारा साथ रहने की उसकी इच्छा पर भी गौर किया।
खंडपीठ ने वैवाहिक जीवन में आने वाली स्वास्थ्य समस्याओं और कठिन परिस्थितियों का मिलकर सामना करने की जिम्मेदारी पर जोर दिया। अदालत ने माना कि कुछ व्यवहारों के वर्णन या अप्रमाणित आरोपों के आधार पर विवाह समाप्त नहीं किया जा सकता। पति ने यह भी स्वीकार किया था कि उसने पत्नी और बच्चे के भरण-पोषण के लिए आर्थिक सहायता नहीं दी। सभी दलीलों और साक्ष्यों की समीक्षा के बाद उसकी अपील नामंजूर कर दी गई।