रांची नगर निगम के पांच जोनल कार्यालय शुरू, स्थानीय स्तर पर मिलेंगी नागरिक सेवाएं

रांची नगर निगम ने पांच जोनल कार्यालय खोले हैं। निगम के अनुसार, इससे प्रमाणपत्र, शिकायत और दूसरी नागरिक सेवाओं के लिए मुख्यालय पर निर्भरता घटेगी।

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रांची नगर निगम के नए जोनल कार्यालय के उद्घाटन का दृश्य

रांची नगर निगम ने शहर में पांच नए जोनल कार्यालय शुरू किए हैं। गांधी जयंती पर महापौर रोशनी खलखो और उप महापौर नीरज कुमार ने इन कार्यालयों का उद्घाटन किया। निगम के मुताबिक, स्थापना के 47 वर्षों बाद नागरिक सेवाओं के काम का इतने बड़े स्तर पर विकेंद्रीकरण किया गया है।

नई व्यवस्था का उद्देश्य लोगों को अपने क्षेत्र के पास ही छोटी नागरिक सुविधाएं, प्रमाणपत्र और शिकायतों के समाधान की सुविधा देना है। इससे हर काम के लिए कचहरी स्थित नगर निगम मुख्यालय जाने की जरूरत कम होने की उम्मीद है। महापौर ने कहा कि कार्यालयों के माध्यम से सेवाओं को अधिक सुलभ, पारदर्शी और तेज बनाने का प्रयास किया जाएगा।

उप महापौर ने इन कार्यालयों को नागरिक सुविधा केंद्र के रूप में विकसित करने की बात कही। नगर आयुक्त सुशांत गौरव के अनुसार, आम लोगों से मिलने वाली प्रतिक्रिया के आधार पर जोनल कार्यालयों की कार्यप्रणाली में सुधार किया जाएगा। निगम कर्मियों से नागरिकों के प्रति संवेदनशील और जवाबदेह रहने को भी कहा गया है।

नए कार्यालय वार्ड 21 के बड़ा तालाब सामुदायिक भवन, वार्ड 32 के पंडरा पंचायत कार्यालय, वार्ड छह के बांधगाड़ी सामुदायिक भवन, वार्ड 40 के एचईसी धुर्वा स्थित सेक्टर-तीन बाजार सामुदायिक भवन और वार्ड 53 के तुपुदाना में खोले गए हैं। ये केंद्र अलग-अलग हिस्सों के निवासियों को स्थानीय स्तर पर निगम से जुड़ी सेवाएं उपलब्ध कराने के लिए बनाए गए हैं।

हालांकि, धुर्वा के एचईसी कॉलोनी स्थित सामुदायिक भवन में कार्यालय खोले जाने का स्थानीय निवासियों ने विरोध किया है। उनका कहना है कि वर्ष 2006 से इस भवन का इस्तेमाल विवाह और अन्य सामाजिक कार्यक्रमों के लिए होता रहा है। निवासियों ने विकास का विरोध नहीं करने की बात कहते हुए कार्यालय के लिए वैकल्पिक भवन की मांग रखी है।

जोनल कार्यालयों की शुरुआत के बाद व्यवस्था की प्रभावशीलता इस बात पर निर्भर करेगी कि वहां कौन-कौन सी सेवाएं नियमित रूप से मिलती हैं और शिकायतों का समाधान कितनी जल्दी होता है। निगम ने नागरिकों के फीडबैक के आधार पर बदलाव का भरोसा दिया है, जबकि धुर्वा में उठे विवाद ने सामुदायिक स्थानों के उपयोग पर संवाद की जरूरत भी सामने रखी है।