झारखंड हाई कोर्ट ने रामगढ़ में औद्योगिक प्रदूषण से संबंधित जनहित याचिका का निपटारा करते हुए राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को निगरानी व्यवस्था प्रभावी बनाने का निर्देश दिया है। अदालत ने रामगढ़ की दो औद्योगिक इकाइयों की हर वर्ष दो बार जांच कराने को कहा है। इनमें कम से कम एक निरीक्षण बिना पूर्व सूचना के किया जाएगा।
चीफ जस्टिस एमएस सोनक और जस्टिस राजेश शंकर की खंडपीठ ने सोमवार को फैसला सुनाया। अदालत ने 27 अगस्त को मामले में निर्णय सुरक्षित रखा था। खंडपीठ ने कहा कि फिलहाल दोनों इकाइयों द्वारा पर्यावरण कानून के लगातार उल्लंघन का प्रमाण नहीं मिला है, लेकिन निगरानी की व्यवस्था में कमियां सामने आई हैं।
अदालत के निर्देश के अनुसार प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के हजारीबाग क्षेत्रीय पदाधिकारी बिहार फाउंड्री एंड कास्टिंग लिमिटेड और दयाल स्टील लिमिटेड का निरीक्षण करेंगे। जांच में चिमनियों के उत्सर्जन, अपशिष्ट और प्रदूषण रोकने वाले उपकरणों की कार्यप्रणाली को शामिल करना होगा। प्रत्येक निरीक्षण की रिपोर्ट दो सप्ताह के भीतर बोर्ड के सदस्य सचिव को सौंपनी होगी।
हाई कोर्ट ने दोनों इकाइयों के सतत उत्सर्जन निगरानी सिस्टम को बोर्ड के सर्वर से लगातार जोड़े रखने का भी निर्देश दिया है। यदि प्रदूषण का स्तर निर्धारित सीमा से 48 घंटे से अधिक समय तक ऊपर रहता है, तो सात दिनों के भीतर कारण बताओ नोटिस जारी करना होगा।
विवा इंटरनेशनल स्कूल के आसपास पानी में फ्लोराइड, टीडीएस और नाइट्रेट की मात्रा निर्धारित सीमा से थोड़ी अधिक मिलने का भी अदालत ने संज्ञान लिया। इस क्षेत्र के पानी की तीन महीने के भीतर मान्यता प्राप्त प्रयोगशाला से दोबारा जांच करानी होगी। दामोदर नदी के मामले में औद्योगिक क्षेत्र के ऊपरी और निचले हिस्से से नमूने लेने का निर्देश दिया गया है। औद्योगिक इकाइयों के कारण प्रदूषण प्रमाणित होने पर पर्यावरणीय क्षतिपूर्ति की कार्रवाई होगी।
खंडपीठ ने कहा कि पर्यावरणीय नुकसान किसी एक जिले की सीमा तक सीमित नहीं रहता और उसका प्रभाव दूर के क्षेत्रों तथा लोगों तक पहुंच सकता है। अदालत ने स्वच्छ और स्वस्थ पर्यावरण को संविधान के अनुच्छेद 21 में निहित जीवन के अधिकार का हिस्सा बताते हुए राज्य को चार महीने के भीतर अनुपालन रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश दिया है।