झारखंड हाईकोर्ट ने जमशेदपुर के जुगसलाई में नीलाम की गई एक संपत्ति में वर्षों से दुकान चला रहे किराएदारों को राहत दी है। अदालत ने स्पष्ट किया कि संपत्ति की बिक्री या नीलामी अपने-आप में किराएदारों को परिसर खाली कराने का आधार नहीं बनती। उन्हें हटाने के लिए संबंधित किराया नियंत्रण कानून में तय आधार और प्रक्रिया का पालन करना आवश्यक है।
जस्टिस आनंद सेन की अदालत ने यह आदेश जुगसलाई निवासी कांति लाल जैन सहित पांच लोगों की याचिका पर सुनवाई के बाद दिया। सभी याचिकाकर्ता संबंधित परिसर में किराएदार के रूप में दुकान चलाते हैं। यह संपत्ति पहले साहू होटल की थी और बिहार स्टेट फाइनेंशियल कॉरपोरेशन से लिया गया ऋण नहीं चुकाए जाने के बाद इसकी नीलामी कर दी गई थी।
नीलामी के बाद 12 मई 2017 को दुकानदारों को परिसर खाली करने का नोटिस जारी किया गया था। इस कार्रवाई को चुनौती देते हुए किराएदार अदालत पहुंचे। सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने कहा कि केवल मालिकाना हक बदलने या संपत्ति बिकने के कारण किराएदारी समाप्त नहीं मानी जा सकती।
अदालत के अनुसार, किराएदारों की बेदखली झारखंड बिल्डिंग (लीज, रेंट एंड एविक्शन) कंट्रोल एक्ट में निर्धारित आधार पर ही हो सकती है। यदि किराएदार को हटाने की कार्रवाई करनी हो तो कानून में दी गई प्रक्रिया अपनाना जरूरी होगा। इस व्यवस्था के बिना सिर्फ नीलामी का हवाला देकर दुकान खाली करने का निर्देश नहीं दिया जा सकता।
हाईकोर्ट ने किराया भुगतान की स्थिति भी स्पष्ट की। अदालत ने कहा कि जब तक कॉरपोरेशन संपत्ति किसी खरीदार को हस्तांतरित नहीं करता, तब तक कब्जा उसके पास रहने के कारण वही मकान मालिक माना जाएगा। इस अवधि में सभी किराएदार अपना किराया कॉरपोरेशन को देंगे। किराया देने में चूक होने पर संस्था संबंधित कानून के तहत नियमानुसार कार्रवाई कर सकेगी।
यदि भविष्य में संपत्ति किसी अन्य व्यक्ति को हस्तांतरित होती है तो किराएदारों को नए मालिक के पास किराया जमा करना होगा। ऐसे हस्तांतरण की जानकारी किराएदारों को देने की जिम्मेदारी कॉरपोरेशन की होगी। इन निर्देशों के साथ हाईकोर्ट ने पांचों दुकानदारों की याचिका का निपटारा कर दिया।