सरायकेला राजमहल के मां पाउड़ी मंदिर में 16 दिवसीय पारंपरिक पूजा शुरू

सरायकेला राजमहल परिसर के मां पाउड़ी मंदिर में तांत्रिक विधि से विशेष पूजा शुरू हुई। अनुष्ठान में अखंड ज्योत, शस्त्र पूजन और पारंपरिक भोग की व्यवस्था है।

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सरायकेला राजमहल परिसर स्थित मां पाउड़ी मंदिर में 16 दिनों तक चलने वाला पारंपरिक पूजा-अनुष्ठान शुरू हो गया है। प्रकाशित विवरण के अनुसार, मंदिर के दिउरी यानी पारंपरिक पुजारी तांत्रिक विधि से आराधना कर रहे हैं। यह अनुष्ठान जिउतिया अष्टमी से महाष्टमी तक जारी रहेगा और विजयादशमी के अवसर पर इसका समापन होगा।

यह परंपरा सरायकेला रियासत की स्थापना से जुड़ी बताई गई है। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, राजा विक्रम सिंह ने वर्ष 1620 में रियासत की स्थापना की थी और उसी समय से यह पूजा होती आ रही है। चार सौ वर्षों से अधिक समय बाद भी राजपरिवार इसके पारंपरिक स्वरूप को बनाए रखने में भूमिका निभा रहा है।

अनुष्ठान के दौरान राजमहल के सुरक्षित और पवित्र माने जाने वाले ‘कोठरी घर’ में कुलदेवी की आराधना की जाती है। इसके साथ रियासत काल की तलवारों और अन्य प्राचीन शस्त्रों का भी विशेष पूजन होता है। पूरे पूजा काल में मंदिर परिसर में अखंड ज्योत जलती रहेगी।

मां पाउड़ी को अर्पित किए जाने वाले प्रसाद के लिए भी निर्धारित परंपराओं का पालन किया जाता है। चावल से तैयार विशेष भोग को स्थानीय भाषा में ‘चावल का घांटरा’ या ‘पुआ’ कहा जाता है। इसे तैयार करने की जिम्मेदारी राजपरिवार की बहुओं की होती है।

पूजा की विधियों में कुष्मांड की बलि का विधान भी शामिल है। विवरण में बताया गया है कि पहले नवमी के दिन बड़ी संख्या में बकरों की बलि दी जाती थी, लेकिन समय के साथ यह प्रथा अब बहुत सीमित और प्रतीकात्मक स्तर तक रह गई है।

विजयादशमी पर राजमाता, रानी और राजपरिवार की अन्य महिलाओं की अगुवाई में शोभायात्रा निकाली जाएगी। इसके बाद मां की प्रतिमा का राजकीय परंपरा के अनुरूप ‘राज तालाब’ में विसर्जन किया जाएगा। यह आयोजन सरायकेला की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत की निरंतरता को दर्शाता है।