खूंटी नगर भवन में रविवार को आयोजित एकदिवसीय विचार गोष्ठी में मुंडारी भाषा को भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने की मांग उठी। जिले के अलग-अलग प्रखंडों से पहुंचे भाषा प्रेमियों, साहित्यकारों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और विभिन्न संगठनों के प्रतिनिधियों ने मुंडारी के भविष्य और संवैधानिक मान्यता से जुड़े विषयों पर विचार रखे।
गोष्ठी का आयोजन मुंडारी साहित्य परिषद रांची, भारत मुंडा समाज और मुंडा महासभा खूंटी सहित कई सामाजिक एवं आदिवासी संगठनों ने संयुक्त रूप से किया। बैठक में भाषा के संरक्षण और संवर्धन के साथ उसे संवैधानिक अधिकार दिलाने के लिए प्रयास तेज करने की आवश्यकता पर चर्चा हुई।
वक्ताओं ने मुंडारी को आदिवासी समाज की संस्कृति, परंपराओं, इतिहास और पहचान से जुड़ी भाषा बताया। उनका कहना था कि इसका महत्व केवल रोजमर्रा के संवाद तक सीमित नहीं है। भाषा से जुड़ी विरासत को आगे बढ़ाने के लिए समाज के भीतर निरंतर पहल और नई पीढ़ी तक उसका प्रसार जरूरी है।
कार्यक्रम में मुंडारी के व्यापक प्रचार-प्रसार तथा शिक्षा के क्षेत्र में इसके उपयोग को बढ़ावा देने की मांग भी सामने आई। प्रतिभागियों ने कहा कि भाषा को उचित सम्मान और अधिकार दिलाने के लिए सामाजिक प्रयासों के साथ सरकारी स्तर पर ठोस पहल की भी जरूरत है। गोष्ठी में आठवीं अनुसूची में शामिल कराने की दिशा में सक्रियता बढ़ाने पर जोर दिया गया।
चर्चा में जिला परिषद अध्यक्ष मसीह गुड़िया, डॉ. मधुरा मुंडा, डॉ. सोमा सिंह मुंडा, अमिता मुंडा, नियारण हेरेंज, बिलकन डांग, ब्रजेंद्र हेमरोम, अरुण कुमार सिंह और डॉ. मनासिद बड़ायुद सहित अनेक प्रतिनिधि उपस्थित रहे। एकदिवसीय आयोजन का मुख्य केंद्र मुंडारी भाषा की पहचान को सुरक्षित रखने और संवैधानिक मान्यता की मांग को संगठित रूप से आगे बढ़ाना रहा।