सीबीआई के पब्लिक प्रॉसिक्यूटर की सेवा समाप्ति में हाईकोर्ट ने हस्तक्षेप से किया इनकार

झारखंड हाईकोर्ट ने पब्लिक प्रॉसिक्यूटर शिव कांत श्रीवास्तव की याचिका खारिज करते हुए कहा कि सेवा समाप्ति निर्धारित नियम और एक महीने के नोटिस के तहत हुई।

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रांची में झारखंड हाईकोर्ट ने सीबीआई के पब्लिक प्रॉसिक्यूटर शिव कांत श्रीवास्तव की सेवा समाप्ति से जुड़े आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया है। जस्टिस दीपक रोशन की अदालत ने आदेश को चुनौती देने वाली उनकी याचिका खारिज कर दी। अदालत के अनुसार, सेवा समाप्त करने की प्रक्रिया तय नियमों के तहत पूरी की गई थी।

उपलब्ध अदालती विवरण के मुताबिक, श्रीवास्तव ने आठ जुलाई को जारी आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। इसी आदेश के माध्यम से उनकी पब्लिक प्रॉसिक्यूटर के रूप में सेवा समाप्त करने की प्रक्रिया शुरू की गई थी। आदेश में उन्हें एक महीने का नोटिस दिया गया और नौ अगस्त से उनकी सेवा समाप्त हुई।

याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई थी कि निर्णय लेने से पहले उन्हें अपना पक्ष रखने का अवसर नहीं मिला। उन्होंने कार्रवाई को भेदभावपूर्ण और दुर्भावना से प्रेरित भी बताया था। सीबीआई की ओर से अदालत को केंद्र सरकार की 30 जनवरी 1997 की अधिसूचना का हवाला दिया गया, जिसके तहत एक महीने का लिखित नोटिस देकर अधिवक्ता की नियुक्ति समाप्त की जा सकती है।

अदालत ने रिकॉर्ड के आधार पर माना कि संबंधित आदेश में नोटिस की अवधि स्पष्ट थी। कोर्ट ने कहा कि जब सेवा समाप्ति निर्धारित प्रावधान के अनुसार की गई हो, तब उस निर्णय को मनमाना नहीं माना जा सकता। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि सरकार को किसी एक अधिवक्ता की सेवाएं जारी रखने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता।

सुनवाई के दौरान पशुपालन घोटाले से जुड़े मुकदमों का संदर्भ भी सामने आया। श्रीवास्तव की ओर से कहा गया कि वह इन मामलों की पैरवी कर रहे थे और वर्ष 2013 के एक पत्र के कारण अधिवक्ता बदलने से पहले हाईकोर्ट की अनुमति आवश्यक थी। अदालत ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया और कहा कि संबंधित मुकदमों की सुनवाई पहले ही पूरी हो चुकी है।

दुर्भावना के आरोप पर भी अदालत ने याचिकाकर्ता को राहत नहीं दी। कोर्ट के मुताबिक, केवल आरोप लगा देना पर्याप्त नहीं है और उसके समर्थन में ठोस सामग्री या प्रमाण होना चाहिए। अदालत ने पाया कि इस मामले में ऐसे आरोपों की पुष्टि करने वाला कोई ठोस प्रमाण रिकॉर्ड पर उपलब्ध नहीं था। इन्हीं आधारों पर याचिका खारिज कर दी गई।