सोन जल समझौते से गढ़वा की कधवन-इंद्रपुरी परियोजना को आगे बढ़ने की उम्मीद

बिहार-झारखंड के बीच सोन नदी के पानी पर सहमति के बाद गढ़वा में प्रस्तावित जलाशय परियोजना से सिंचाई और पेयजल सुविधा बेहतर होने की उम्मीद बढ़ी है।

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गढ़वा में प्रस्तावित कधवन-इंद्रपुरी सोन जलाशय और सिंचाई परियोजना का सांकेतिक दृश्य

गढ़वा जिले में लंबे समय से प्रस्तावित कधवन-इंद्रपुरी वृहद सोन जलाशय परियोजना को बिहार और झारखंड के बीच हुए सोन जल बंटवारा समझौते से नई गति मिलने की उम्मीद है। समझौते में झारखंड के लिए सोन नदी का दो मिलियन एकड़ फीट पानी निर्धारित करने पर सहमति बनी है। हालांकि परियोजना को जमीन पर उतारने की आगे की प्रक्रिया अभी बाकी है।

प्रस्तावित बहुउद्देशीय परियोजना की लागत 11,600 करोड़ रुपये से अधिक बताई गई है। इसके अंतर्गत सोन नदी पर जलाशय और नहरों का नेटवर्क विकसित करने का प्रस्ताव है। यह व्यवस्था गढ़वा के संबंधित क्षेत्रों तक पहुंचने पर बारिश पर निर्भर खेती को सिंचाई का स्थायी आधार दे सकती है।

जिले के किसान अभी मुख्य रूप से वर्षा के सहारे खेती करते हैं। प्रस्तावित नहरों से पानी उपलब्ध होने पर खरीफ के साथ रबी फसलों का दायरा बढ़ने की संभावना जताई गई है। धान, गेहूं, दलहन, तिलहन और सब्जियों की खेती को लाभ मिलने तथा किसानों की वर्षा पर निर्भरता घटने की उम्मीद है।

परियोजना का दूसरा पक्ष विस्थापन और भूमि अधिग्रहण से जुड़ा है। उपलब्ध विवरण के अनुसार गढ़वा के 12 राजस्व गांव प्रभावित हो सकते हैं। इनमें केतार प्रखंड के नौ और खरौंधी प्रखंड के तीन गांव शामिल हैं। पूरी परियोजना से तीन राज्यों के कुल 58 गांव प्रभावित होने और 17,425 हेक्टेयर से अधिक भूमि के अधिग्रहण का प्रस्ताव बताया गया है। इसमें लगभग 2,061 हेक्टेयर वन भूमि भी शामिल है।

प्रभावित परिवारों के मुआवजे और पारदर्शी पुनर्वास की व्यवस्था परियोजना की प्रगति के साथ महत्वपूर्ण विषय रहेगी। अभी उपलब्ध जानकारी प्रस्तावित लाभ और संभावित प्रभावों को रेखांकित करती है; निर्माण, नहरों की पहुंच तथा पुनर्वास से जुड़े अंतिम निर्णय आगे की प्रशासनिक प्रक्रिया पर निर्भर होंगे।

जलाशय और नहर व्यवस्था से सिंचाई के अलावा पेयजल उपलब्धता तथा आसपास के भूजल स्रोतों में सुधार की भी संभावना बताई गई है। परियोजना में करीब 450 मेगावाट पनबिजली उत्पादन का प्रस्ताव भी है। ऐसे में इसके आगे बढ़ने पर कृषि, जल सुरक्षा और ऊर्जा क्षेत्र पर व्यापक असर पड़ सकता है।