सोन नदी जल बंटवारे पर बिहार-झारखंड में समझौता, झारखंड को मिलेगा 2 एमएएफ पानी

दिल्ली में हुए समझौते के तहत सोन नदी के पानी में बिहार को 5.75 एमएएफ और झारखंड को 2 एमएएफ हिस्सेदारी देने पर औपचारिक सहमति बनी है।

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सोन नदी जल बंटवारे के समझौते के दौरान उपस्थित बिहार, झारखंड और केंद्र सरकार के प्रतिनिधि

बिहार और झारखंड के बीच सोन नदी के जल बंटवारे को लेकर करीब 25 वर्षों से लंबित विवाद पर सहमति बन गई है। दिल्ली में दोनों राज्यों ने समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए। नए समझौते के अनुसार अविभाजित बिहार को आवंटित पानी में से बिहार को 5.75 मिलियन एकड़ फीट (एमएएफ) और झारखंड को 2 एमएएफ पानी मिलेगा।

समझौते के समय केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह, केंद्रीय जल शक्ति मंत्री सीआर पाटिल, बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी और झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन उपस्थित थे। बिहार के उप मुख्यमंत्री एवं जल संसाधन मंत्री विजय कुमार चौधरी के साथ केंद्र और दोनों राज्य सरकारों के वरिष्ठ अधिकारी भी कार्यक्रम में शामिल हुए।

विवाद की पृष्ठभूमि वर्ष 1973 के बाणसागर समझौते से जुड़ी है। उस व्यवस्था के तहत सोन नदी के कुल 14.25 एमएएफ पानी में मध्य प्रदेश को 5.25 एमएएफ, उत्तर प्रदेश को 1.25 एमएएफ और तत्कालीन अविभाजित बिहार को 7.75 एमएएफ हिस्सा दिया गया था। वर्ष 2000 में झारखंड बनने के बाद 7.75 एमएएफ पानी को दोनों राज्यों में बांटने का प्रश्न लंबित रहा।

इस विषय पर 10 जुलाई 2025 को रांची में आयोजित पूर्वी क्षेत्रीय परिषद की 27वीं बैठक में महत्वपूर्ण सहमति बनी थी। इसके बाद अलग-अलग स्तरों पर बातचीत और तकनीकी विचार-विमर्श किया गया। अब समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर के साथ बिहार और झारखंड की हिस्सेदारी को औपचारिक रूप दे दिया गया है।

समझौते से झारखंड के पठारी और सूखा प्रभावित इलाकों में पानी की उपलब्धता बेहतर होने की उम्मीद जताई गई है। उपलब्ध विवरण के अनुसार इससे सिंचाई सुविधाओं के विस्तार, पेयजल संकट कम करने और दीर्घकालिक जल सुरक्षा मजबूत करने में मदद मिल सकती है। औद्योगिक गतिविधियों को भी इससे लाभ मिलने की संभावना बताई गई है।

दोनों राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने समझौते के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के प्रति आभार जताया। बिहार के मुख्यमंत्री ने इसे दोनों राज्यों के बीच सहयोग और साझा विकास की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बताया। समझौते का व्यावहारिक असर अब आवंटित पानी के उपयोग और संबंधित जल परियोजनाओं के क्रियान्वयन पर निर्भर करेगा।