स्पेशल ब्रांच के दारोगा सामान्य पुलिस कैडर में नहीं होंगे, हाईकोर्ट ने खारिज की मांग

झारखंड हाईकोर्ट ने स्पेशल ब्रांच और जिला पुलिस को अलग कैडर माना है। हालांकि भर्ती विज्ञापन में सेवा शर्त स्पष्ट नहीं होने के कारण 174 अभ्यर्थियों को गृह विभाग में अभ्यावेदन देने की छूट मिली है।

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रांची स्थित झारखंड हाईकोर्ट से संबंधित सांकेतिक दृश्य

रांची में झारखंड हाईकोर्ट ने स्पेशल ब्रांच में नियुक्त दारोगाओं को सामान्य पुलिस कैडर में शामिल करने की मांग खारिज कर दी है। जस्टिस दीपक रोशन की अदालत ने स्पष्ट किया कि दोनों पदों के लिए एक ही प्रतियोगी परीक्षा आयोजित होने मात्र से उनका कैडर एक नहीं हो जाता। अदालत ने स्पेशल ब्रांच के पदों को सामान्य कैडर में बदलने का निर्देश देने से भी इनकार किया।

यह मामला झारखंड कर्मचारी चयन आयोग की संयुक्त पुलिस अवर निरीक्षक प्रतियोगिता परीक्षा-2017 से जुड़ा है। याचिकाकर्ताओं ने चयन प्रक्रिया में स्पेशल ब्रांच को अपनी प्राथमिकता के रूप में चुना था। परीक्षा में सफल होने के बाद वर्ष 2018 में उनकी नियुक्ति दारोगा पद पर हुई थी।

अभ्यर्थियों ने अदालत के समक्ष कहा कि भर्ती विज्ञापन में स्पेशल ब्रांच के पदों के क्लोज्ड कैडर का हिस्सा होने की स्पष्ट जानकारी नहीं दी गई थी। उनके अनुसार, नियुक्ति पत्र मिलने के बाद इस व्यवस्था का पता चला। याचिकाकर्ताओं का कहना था कि अलग और बंद कैडर में रहने से स्थानांतरण, पदोन्नति तथा भविष्य की सेवा संभावनाओं पर असर पड़ता है।

राज्य सरकार ने अपना पक्ष रखते हुए बताया कि स्पेशल ब्रांच का अलग क्लोज्ड कैडर वर्ष 2009 में गठित किया गया था। सरकार के मुताबिक इसका उद्देश्य खुफिया सूचना जुटाने जैसे विशेष कार्यों के लिए प्रशिक्षित, योग्य और अनुभवी कर्मियों की निरंतर उपलब्धता बनाए रखना है।

अदालत ने भर्ती विज्ञापन में स्पेशल ब्रांच के पदों की इस महत्वपूर्ण सेवा शर्त को स्पष्ट नहीं किए जाने को विभागीय चूक माना। हाईकोर्ट ने कहा कि भर्ती विज्ञापन में पदों की पहचान और उनसे जुड़ी अहम शर्तों की साफ जानकारी दी जानी चाहिए। इसी के साथ 174 अभ्यर्थियों की याचिकाओं का निष्पादन कर दिया गया।

हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ताओं को गृह विभाग के सक्षम प्राधिकार के सामने विस्तृत अभ्यावेदन प्रस्तुत करने की छूट दी है। वे आदेश अपलोड होने की तारीख से चार सप्ताह के भीतर आवेदन दे सकेंगे। सक्षम प्राधिकार को अभ्यावेदन मिलने के 12 सप्ताह के भीतर नियमों के अनुसार कारणयुक्त आदेश पारित करना होगा।