रांची में झारखंड हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि स्पेशल ब्रांच में नियुक्त दारोगाओं को सामान्य पुलिस कैडर में शामिल करने का निर्देश नहीं दिया जा सकता। जस्टिस दीपक रोशन की अदालत ने कहा कि स्पेशल ब्रांच और जिला पुलिस के पदों के लिए एक ही प्रतियोगी परीक्षा आयोजित होने मात्र से दोनों का कैडर समान नहीं हो जाता।
अदालत ने 174 अभ्यर्थियों से संबंधित दो रिट याचिकाओं का निष्पादन करते हुए उन्हें गृह विभाग के सक्षम प्राधिकार के सामने विस्तृत अभ्यावेदन देने की छूट दी है। अभ्यर्थी आदेश अपलोड होने की तारीख से चार सप्ताह के भीतर अपना पक्ष रख सकेंगे।
हाईकोर्ट ने सक्षम प्राधिकार को भी समयसीमा में निर्णय लेने को कहा है। अभ्यावेदन प्राप्त होने के 12 सप्ताह के भीतर नियमों के अनुसार कारणयुक्त आदेश पारित करना होगा। इस व्यवस्था से अभ्यर्थियों को अपनी सेवा से जुड़ी आपत्तियां विभागीय स्तर पर रखने का अवसर मिलेगा।
मामला झारखंड कर्मचारी चयन आयोग की संयुक्त पुलिस अवर निरीक्षक प्रतियोगिता परीक्षा-2017 से जुड़ा है। आयोग ने विज्ञापन संख्या 05/2017 के माध्यम से जिला पुलिस और स्पेशल ब्रांच में दारोगा पद पर नियुक्ति के लिए आवेदन मांगे थे। याचिकाकर्ताओं ने परीक्षा में भाग लेने के साथ अपनी प्राथमिकता में स्पेशल ब्रांच का चयन किया था और वर्ष 2018 में उनकी नियुक्ति हुई थी।
अभ्यर्थियों का कहना था कि भर्ती विज्ञापन में स्पेशल ब्रांच के पदों के बंद कैडर में होने की जानकारी स्पष्ट रूप से नहीं दी गई थी। नियुक्ति पत्र मिलने के बाद उन्हें इस प्रावधान का पता चला। उनके अनुसार बंद कैडर के कारण स्थानांतरण, प्रोन्नति और सेवा की भावी संभावनाओं पर प्रभाव पड़ता है।
राज्य सरकार ने अदालत को बताया कि स्पेशल ब्रांच का अलग बंद कैडर वर्ष 2009 में गठित किया गया था। गृह विभाग ने तीन जून 2009 को इसके पुनर्गठन और अलग कैडर का संकल्प जारी किया था, जबकि 18 अक्टूबर 2010 की अधिसूचना से संबंधित प्रावधानों में संशोधन हुआ। अदालत ने विज्ञापन में बंद कैडर की स्पष्ट जानकारी नहीं दिए जाने को विभागीय चूक माना, लेकिन पदों को सामान्य कैडर में बदलने का निर्देश देने से इनकार कर दिया।